रविवार, 22 मई 2011

बात निकली है...

बात अलग पृथक पूर्वांचल की



भारत को आजाद हुए 63 साल बीत चुके। विकास के पैमाने बदले। बैलगाड़ी से मोटर गाड़ी तक का सफर तय हुआ और पाती से मोबाइल की थाती तक। विकास की दौड़ में भारत हांफता हुआ चल रहा है। जहां अनेकों कल कारखानों का विकरस हुआ वहीं कदीमी दस्तगीरी ने दम तोड़ना शुरू किया। 18 करोड़ आबादी वाले उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका प्रति व्यक्ति आय में काफी पीछे है। लड़खड़ाती कास्तकारी दम तोड़ती दस्तगीरी विकराल रूप धारण करती बेरोजगारी हर रोज इलाका छोड़ते मजदूर और एक के बाद एक बन्द होते उद्योग धन्धे अलग पूर्वांचल राज्य की मांग की खास वजह हैं।
आजादी के बाद दर्जन भर से ज्यादा राज्य बने होंगे। सभी नये राज्यों में पूर्वांचल की आबादी ज्यादा होने के बावजूद केन्द्र राज्य सरकार की उपेक्षा का दंश झेलता यह इलाका आज गरीबी और बेरोजगारी की चपेट में जीवन की आाखिरी सांसे गिन रहा है। इस इलाके में बेरोजगारों और मजदूरों की फौज खड़ी है जो जीवन की तलाश में मुम्बई दिल्ली असम गुजरात आदि जगहों पर जाते हैं जहां इनके पेट की आग को पूरबिया कह के लात-जूतों और लाठी-डंडों से शान्त किया जाता है।
चूंकि अबसे पहले शुरू आन्दोलनों के लड़खड़ा जाने की वजह से अलग पूर्वांचल राज्य की मांग परवान नहीं चढ़ सका है हालांकि अमर सिंह का लोकमंच एक जन आन्दोलन खड़ा करने की पहल है। अब यहां सबसे अहम सवाल यह खड़ा होता है कि अलग पूर्वांचल राज्य के इस पहल का अंजाम क्या होगा और इस पूर्वांचल की जनता इसे कितना स्वीकार करेगी ? इस बाबत लोकमंच के राष्टीय प्रवक्ता असगर खां कहते हैं कि आजादी के बाद पूर्वांचल के विकास पर सरकारों ने तवज्जो नही दिया है। भेदभाव पूर्ण नीतियों के चलते ही यह इलाका पिछड़ा है। बात अगर वर्तमान यूपी सरकार की करें तो बुतों के लिए 500 करोड़ रूपये का इंतजाम होता है और पूर्वांचल के जिन्दा लाशों के लिए सिर्फ 20 करोड़ रूपये। यही वजह है कि यह इलाका आज मुल्क का सबसे पिछड़ा गरीब और शोषित बनकर रह गया है। तकरीबन 9 करोड़ आबादी में पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। डेढ़ करोड़ नौजवान बेरोजगार हैं। लोगों के चलते काफिले से यह कहा जा सकता है कि अब लोग अपने अधिकारों को पाने के लिए जागरूक हो गये हैं।
सत्ता के विकेन्द्रीकरण और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए छोटी-छोटी राजनीतिक इकाईयों का होना जरूरी मानकर कभी उठाया गया पूर्वांचल राज्य का अवधारण 60 साल पुराना माना जाता है। मगर दमदार कद्दावर नेतृत्व के बगैर तो यह राजनीतिक दलों का मुद्दा बन पाया और ही जन आन्दोलन का रूप ले सका। छठे दशक में उत्तर प्रदेश के 7554 किलोमीटर के फैलाव वाले 16 जिलों अब 8 मण्डल और 27 जिलों तक फैल चुकी है; को मिलाकर परिकल्पित पूर्वांचल को अलग राज्य बना दिया जाए तो इसका क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश के वर्तमान क्षेत्रफल का तिहाई तथा सन् 2000 में गठित उत्तरांचल के डेढ़ गुना से भी ज्यादा होगा। इस तरह प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में आठ मण्डल- इलाहाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर, गोरखपुर, आजमगढ, बस्ती, फैजाबाद देवीपाटन के 27 जिले इलाहाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, चन्दौली, गाजीपुर, बलिया, देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज संतकबीरनगर सिद्धार्थनगर बस्ती बलरामपुर गोंडा कौशाम्बी बहराइच श्रावस्ती फैजाबाद अम्बेडकरनगर, आजमगढ, मउ, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, भदोही, मिर्जापुर सोनभद्र जिले शामिल हैं। प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में 28 लोकसभा 147 विधानसभा क्षेत्र आयेंगे।
अतीत के आइने में अगर देखें तो पं0 जवाहर लाल नेहरू के समय में तत्कालीन संासद गाजीपुर विश्वनाथ प्रसाद गहमरी संसद में पुर्वांचल के पिछड़ेपन की चर्चा करते हुए रो पड़े थे जिससे आहत होकर तत्कालीन
प्रधानमंत्री श्री नेहरू जी ने पूर्वांचल के आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पटेल आयोग का गठन किया था। पुर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में इस आयोग ने दौरा कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी मगर दूसरे आयोगों की तरह इसका भी नतीजा सिफर निकला। पुर्वांचल पर पटेल आयोग की रिपोर्ट योजना आयोग की फाइलों में दबी पड़ी है। गहमरी जी नहीं रहे मगर पूर्वी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग गाहे-बेगाहे उठती रहती है।
आजादी के छः दशक बीत जाने के बाद भी पृथक पूर्वांचल राज्य के गठन का सपना साकार नहीं हो पाया है।
आज हालात इस कदर बदतर हो गये हैं कि पूर्वांचल के गरीब किसान के घर अगर बेटा पैदा होता है तो उसे मुम्बई दिल्ली असम गुजरात में पिटते मजदूरों का डर सताने लगता है और कहीं लड़की पैदा हो जाती है तो वह लड़की के हाथ पीला करने की सोच से खुद पीला पड़ के मुरझाने लगता है। बहन का हाथ पीला करने के लिए भाई मुम्बई, दिल्ली, असम, गुजरात, गुडगांव जाकर हाड़तोड़ मेहनत करके खुद काला पड़ जाता है मगर बहन के हाथ पीला करने की चक्कर में वहां से लाता है टी. बी. कैंसर दमा एड्स जैसी खतरनाक बीमारीयां।
पूर्वांचल के बुनकरों का हाल बदहाल है। 90 के दशक में बुनकारी ने दम तोड़ना शुरू किया तो बनारस के करघा मालिक नाजिम जमील जुनैद जैसे तमाम करघा बेचकर रिक्शा चलाना शुरू किया। जैसे-जैसे हालात खराब होते गयें ये लोग दूसरे प्रदेशों के साथ खाड़ी मुल्कों का रूख अख्तियार करना याुरू किया। नजीर कबीर के विरासत का कभी ऐसा हश्र होगा शायद किसी ने यह सोचा नहीं था। बात पूर्वांचल राज्य की चल रही है तो अगर बनारस के आस-पास का सांस्कृतिक कारोबार धार्मिक स्टक्चर देखा जाए तो इससे बुनकरों को खास फायदा होगा। बनारस ही नहीं बल्कि आजमगढ़ मुबारकपुर मउ गोरखपुर मिर्जापुर भदोही के कदीमी दस्तगीरों को उनके जीने की आस जग जाएगी।
पूर्वांचल में 12 हजार मेगावाट बिजली पैदा होती है जो इसके विकास की जरूरत से ज्यादा है। बन्द पड़े चीनी मिलों के चालू हो जाने से किसानों को जहां रवानी मिलेगी वहीं गोरखपुर के फर्टिलाइजर कम्पनी के चालू हो जाने से किसानी को जिन्दगानी हासितल हो सकती है। मउ का हथकरघा बनारस की साड़ी भदोही का कालीन मिर्जापुर के पीतल का कारोबार और चुनार के चीनी मिट्टी के कुटीर उद्योग जो दम तोड़ रहे हैं उनके शुरू हो जाने से पूर्वांचल के किसानों बेरोजगार नौजवानों को जरिया--मास का इंतजाम हो सकता है जिससे उनके जीने की उम्मीद पैदा हो सकती है। पृथक पूर्वांचल राज्य की मांग करने वाले इस उम्मीद से चल रहे हैं कि-
जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नजर है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नही देखा।

एम. अफसर खां सागर
09889807838

2 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्वांचल के साथ हर समय व्यवस्था ने विश्वासघात किया है..
    हमारे माननीय गण भी वोट से ज्यादा नहीं सोचते...
    अमर सिंह से भी ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते क्युकी उनका अपना अलग राजनैतिक चरित्र है...
    पूर्वांचल का विश्लेषण करती बहुत सुन्दर कृति आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूर्वांचल को ईमानदार और जुझारू नेता चाहिए। लफ़्फ़ाज़ी और जातिवाद की राजनीति करने वाले विश्वासघाती अमर सिंह या मायावती नहीं।

    उत्तर देंहटाएं