गुरुवार, 26 जनवरी 2012

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश है आचार संहिता

{इस लेख के माध्यम से हम आचार संहिता पर अंगुली नहीं उठा रहे है, बल्कि जो हम देख और महसूस कर रहे है वही व्यक्त कर रहे है.}
बचपन में जब हम गाव में रहते थे और चुनाव का दौर आता था तो हम खुश हो जाते थे. जब कोई प्रचार वाहन आता तो हम बच्चे बड़े खुश हो जाते. हमें झंडा और पोस्टर मिल जाता था, हम लोग झंडा हाथ में लेकर एक टोली में गाव में घूमा करते. हमें याद है उस समय नारे लगाकर घूमना बड़ा अच्छा लगता था, खूब मस्ती होती, फिर मुख्य चुनाव टी.एन. शेषन बने उन्होंने फिजूल खर्ची पर काफी रोक रोक लगा दी, वहा तक सबकुछ ठीक था. किन्तु इस बार जो हालात बने है. वह मेरी खुद की राय में कही से भी उचित नहीं है. चुनाव में व्याप्त भ्रष्टाचार और फिजूल खर्ची रोकने के नाम पर लोंगो को डराया जा रहा है. बेवजह लोंगो को परेशां किया जा रहा है. और यह सब कुछ चुनाव में पारदर्शिता लाने के नाम पर हो रहा है. और सब चुप्पी साधे पड़े है. आचार संहिता की हनक ऐसी की कोई जुबान नहीं खोल रहा कही मुकदमा न दर्ज हो जाय.
भले ही लोग कह रहे है की ऐसे ही होता रहा तो एक आम आदमी भी चुनाव लड़ सकता है.. जबकि आम और इमानदार व्यक्ति को चुनाव में रोकने के लिए एक गहरी साजिस रची जा रही है.... मैं मीडिया से जुडा व्यक्ति हूँ और अभी तक मुझे ही नहीं पता की कितने प्रत्यासी हमारे जनपद से चुनाव लड़ रहे है, हो सकता है सभी का परचा दाखिल हो जाय उसके बाद पता चल जाय पर सभी के चुनाव चिन्ह याद रखना तो बहुत ही मुश्किल है. आज किसी आम आदमी से पूछा जाय की कितने चुनाव चिन्ह उसे याद है तो  शायद बमुश्किल चार या पार्टियों के चुनाव चिन्ह उसे याद रहेंगे,  छोटे दलों के प्रत्यासी अपनी पहचान भी नहीं बता पा रहे हैं. सोचना यह है की जो अपनी पहचान नहीं बता पा रहा है, वह मतदाताओ को कैसे समझा पायेगा. पूरा चुनाव उसे अपना परिचय देने में ही बीत जायेगा. क्या ऐसा नहीं हो सकता की बड़े दलों और चुनाव आयोग की यह मिलीजुली साजिश हो ताकि छोटे दल और निर्दल प्रत्यासी चुनाव लड़ने की जुर्रत भी नहीं कर पाए.
देखा जा रहा है की हर व्यक्ति आज खुद को डरा हुआ महसूस कर रहा है. कही भी सार्वजानिक स्थल पर किसी दल का नाम लेने से भी घबरा रहा है. किसी का झंडा अपने मकान पर लगाने से डर रहा है. चारो तरफ एक अजीब सी  ख़ामोशी व्याप्त है और लोग इश्वर से प्रार्थना कर रहे है की जल्दी से चुनाव बीत जाय... व्यापारी वर्ग व्यापर के सिलसिले में पैसा लेकर जाने से डर रहा है. यहाँ तक की बैंक की वैन भी पिछले दिनों पुलिसे ने रोक ली., करीब चार माह पूर्व भदोही में पीस पार्टी की रैली हुयी थी, आचार संहिता लागू होते ही प्रशासन ने सार्वजानिक स्थलों पर लगे झंडे बैनर हटवा लिए... इत्तफाक से एक झंडा टेलीफोन के खम्भे पर रह गया था, एक फुट का यह झंडा धुप और पानी से गल गया था, पर उसे उतार कर डॉ.अयूब के ऊपर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. वाराणसी रोड के एक पेड़ पर रैली के समय का ही फ्लेक्स लगा था, चौरी पुलिस ने उसका भी मुकदमा दर्ज कर लिया. यहाँ तक की जनपद के लगभग हर प्रत्याशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चूका है. जिसमे ९० प्रतिशत ऐसे मामले है जिसे देखकर हंसी भी आती है. आचार संहिता के नाम आम आदमी को डराया जा रहा है.
मिडिया पर अंकुश लग चुका है. खैर इस मामले में मैं मिडिया को ही दोषी मानता हूँ. पेड न्यूज़ के कारण मिडिया ने जो किया था. उसका खामियाजा तो उसे भुगतना ही था. पैसे लेकर गलत खबरे छापने से ही मिडिया की गरिमा गिरी है. लगभग सभी अख़बार पैसे वाले प्रत्यासियो की रखैल बन चौके है. और इसका खामियाजा वे पत्रकार उठा रहे है. जो निष्पक्ष होकर खबरे लिखना चाहते है पर उन्हें मौका नहीं मिल रहा है. हाथ पैर बांध दिए गए है.
निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा उठाये गए कदम सराहनीय है., पर जिस आचार संहिता के चलते किसी की रोज़ी रोटी छीन जाय, व्यवसायियों एवं आम आदमी में भय व्याप्त हो, लोग खुलकर अपनी बात न कर सके. सच की आवाज़ दबा दी जाय,  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगे. प्रशासन निरंकुश होकर मनमानी करे. ऐसी आचार संहिता का औचित्य कम से कम मुझे तो समझ में नहीं आ रहा .

4 टिप्‍पणियां:

  1. harish jee,

    apane jo bayan kiya usase main shat pratishat sahmat nahin hoon, achar sanhita jaroori hai nahin to apako bhi pata hai ki chunav kee ghoshna se lekar chunav hone tak aam aadami kitna trast ho jata tha. laudspeaker kee aavajen na pariksha dekhati thee aur na kisi kee bimari. khareed pharokht khule aam chalti thee aur bhole bhale graminon ko rupaye , sharab aur dhoti baant kar khareed liya jata tha. unhen nahin maloom tha ki isa muhar ke lagane ka arth kya hai?
    bagair aachar sanhita ke chunav bhi sirdard the. han abhivyakti kee svatantra honi chahie. lekin hone deejiye anjaan chehre agar chunav men aa rahe hain to unaki agar apane kshetra men sakh hogi to ve jaroor isaka phayada uthayenge. gharon par jhande na lagana hi theek hai. pichhale chunav men ek ghar men char char jhande laga gaye the log . baki logon se anjanai dushmani ban jati hai. isaliye aachar sanhita jaroori hai. itani sakht na sahi phir bhi honi jaroor chahie.

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  2. रेखा जी मैं आपकी बात से सहमत हु, पर आचार संहिता के नाम पर प्रशासन की गुंडई पर एतराज़ है. लाउड स्पीकर पर पाबन्दी तक ठीक है. जिससे आम जनता को परेशानी हो उस कम पर लगाम लगनी चाहिए पर प्रशासन खुद आम जनता को आचार संहिता के नाम पर परेशां करे यह ठीक नहीं है. मैं कई घटनाओ को इधर बीच देखा.... कोई व्यापारी जा रहा है, उसे परेशां करना. बैंक का पैसा रोक कर सैकड़ो ग्राहकों को परेशां करना. किसी भी शरीफ नागरिक को मुकदमे में पाबंद करना, आप जानती है पुलिस ने सैकड़ो ऐसे लोंगो को मुकदमे में फंसाया है जिन्हें इन सब बातो से कुछ लेना देना नहीं है. ५ साल के बच्चे तक मुकदमो में पाबंद हो गए है. १९७७ में मरे एक व्यक्ति तक को पाबंद कर दिया गया. हद तो यह है की दर का ऐसा माहौल पैदा कर दिया जा रहा है और यह सब कुछ आचार संहिता के नाम पर.... क्या यह सब करने से हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था मजबूत होगी.... इस बात पर कोई गौर किया की आयोग जितना कड़ा रुख अख्तियार कर रहा है. मतदान का प्रतिशत उतना ही गिर रहा है. मत देना लोग फालतू काम सोचने लगे है... आखिर क्यों ? इस पर तो खुली बहस होनी चाहिए.

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  3. Ji haan..code of conduct ke karan bahut dikkat ho jati hai. Police vewajah logon ko pareshan karti hai. Khud mere satha aisa hua hai. Main bhartiya sena mein karyarat hun. Last yr jab himachal mein aachar sanhita lagu thi tab min chhutti aate samay apne ghar ke raaste se na aa kar dusre route se ghumkar aa raha tha kyunki chintpurni mein mere ek dost se milna tha to raaste mein una mein police ne raat ko mujhe dekh kar ghatiya swal puchhe aur mujhe daraya dhamkaya jaise main koi mujrim hun. Mere paad leave cert aur iden card bhi tha phir bhi wo mujhe interrogate kar rahe the

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