शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

श्री राम प्रसाद बिस्मिल

श्री राम प्रसाद बिस्मिल

यह महावीर क्रांतिकारी ,मात्र एक क्रांतिकारी नहीं थे ,ये इतिहास थे उस कविता के जिसे पढ़ कर उस समय और आज भी क्रांतिकारियों  के मन में राष्ट्रभक्ति हिलोरें मारती हैं 
उस   कविता का नाम है -
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ||
देखना है जोर कितना बाजू ऐ कातिल में है ||

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल गजब के कवी और शायर थे ,बड़े तगड़े थे जो उनसे मिलता कहता "कदाचित किसी और समय या किसी और देश में होते तो सेनानायक होते ,
आपका जन्म १८९७ में उत्तरप्रदेश के शाहजहाँ पुर में हुआ था ,आपके जीवन को क्रांति की ओर मोड़ने में आपकी माता का बड़ा योगदान रहा, आपकी माता ने आपका मार्गदर्शन ठीक वैसे ही किया जैसे मैजेनी  नामक वीर क्रांतिकारी की माता ने मैजेनी का किया था,आपकी माँ ने आपसे मानव रक्त से अपने हाथ न लाल करने की सौगंध ली थी और आपने इसका आजीवन पालन किया  ,आप बचपन में पिता से बहुत मार खाते थे और आप अपने संस्मरणों में लिखते हैं "कदाचित बचपन में मार खा खा कर आपकी देह जुल्म सहने के योग्य हुई | खैर ,जब आप के बचपन के बारे में मेरे पास अधिक साहित्य नहीं ,इसके लिए क्षमा  चाहूँगा , जब आप युवा  हुए तब आप "हिंदुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य बन गए , उस दल के संस्थापक श्री सचिंद्रनाथ सान्याल (ये संस्थापक चंद्रशेखर आजाद से पूर्व थे इस दल के इन्ही के नेत्रत्व में आजाद जी ने भी काम किया था ) आपके व्यक्तित्व , आपकी कविता के कायल थे ,दल के सभी सदस्य आपका बड़ा आदर करते थे ,कुछ समय बाद आपकी भेंट एक अन्य वीर क्रांतिकारी शहीद अशफाकुल्ला खान से हुई और आप दोनों एक प्राण दो
शरीर  बन गए (जैसे भगत सिंह और सुखदेव ) अशफाकुल्ला खान भी इसी दल में थे और आप दोनों सदा साथ रहा करते थे ,चंद्रशेखर आजाद आपके सबसे प्रीय अनुगामी थे , 
सचिंद्रनाथ सान्याल बाबु के अकस्मात् पकडे जाने से दल के कार्य का सारा भार आपके कन्धों पर आ गया ,आपको दल का नेता बनाया गया ,और आपके नेत्रत्व में दल ने दुष्ट पूंजीपतियों के घर डाके डाले दल के धन जमा करने के लिए ,आपने और आपके साथियों ने दल के धन से एक पैसा स्वयं पर न खर्च किया ,ऐसे स्वाभिमानी थे आप सब ,  चंद्रशेखर आजादजी के कहने पर अब निश्चय हुआ हिन्दुस्थानियों के दल में डाका डालने से बदनाम होने से अच्छा है की अंग्रेजी साम्राज्य के खजाने पर डाका डाला जाए ,आपको यह  योजना पसंद आई और सबने इस बात की स्वीकृति भर दी | शीघ्र ही इसका अवसर आ भी गया ,आपको पता चला की सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली रेलगाड़ी में अंग्रेजी खजाना जा रहा है जिसमे बहुत धन है और वो धन दल के हाथ लग गया तो दल  को बहुत सहायता मिलेगी , आपने सबकी सहमति से निश्चय किया की इस रेलगाड़ी पर बिना किसी प्राण हानि के डाका दल कर यह खजाना हथिया लिया जाए , किन्तु अशफाकुल्ला खान ने चिंता व्यक्त की "अभी दल अंग्रेजी हुकूमत को इतना करारा थप्पड़ मारने के लिए शक्तिशाली नहीं ,यदि यह योजना हुई तो दल के नष्ट होने का खतरा है " किन्तु धन की कमी से विवश हो कर किसी ने गौर न किया गया ,आप इस कार्यवाही के नेता हुए ,इस कार्य में अशफाकुल्ला ,रोशन सिंह ,राजेंद्र लिहिरी ,चंद्रशेखर आजाद ,मुकुन्दी लाल आदि साथी शामिल थे ,९ अगस्त १९२५ को रात्री में इस कार्यवाही को अंजाम दिया गया ,इस कार्यवाही से अंग्रेजी हुकूमत सकते में आ गयी ,पूरे भारत में क्रांतिकारियों की धर पकड़ आरंभ हो गयी विशेष रूप से आपकी और आजाद जी की (जो पुलिस के पहले ही सबसे भयानक शत्रु थे ) एक साथी की गद्दारी के कारण आप और अशफाक जी पकड़ लिए गए , और अन्य साथी भी पकड़ लिए (चंद्रशेखर आजाद को छोड़ कर )  ,पुलिस ने आप पर सैकड़ों अत्त्याचार किये की आप अपना गुनाह मान लें और आजाद जी का पता बता दें ,किन्तु आप ने सबही जुल्मों को हँसते हुए सहा और दल के उत्तराधिकारी  चंद्रशेखर आजाद पर आंच न आने दी , आप जेल में शायरी करते ,कविता करते ,खूब प्रसन्न रहते ,आप पर काकोरी काण्ड पर मुकदमा चला जिसमे अँगरेज़ सरकार का लगभग १ लाख रूपया खर्च हुआ , सरकारी गवाह पंडित जगतनारायण मुल्ला ने आप को फांसी लगवाने में बहुत  मेहनत की जिससे अंग्रेजों ने आपको बहुत धन दिया  ,अंत में न्याय का ढोंग खत्म हुआ आपको ,अशफाकुल्ला , रोशन सिंह ,राजेंद्र लिहिरी को मृत्युदंड मिला ,यह सुन कर आप सब प्रसन्नता से फूले न समाये ,आपने  दंड सुनने के बाद सरकारी वकील को अपनी इस कथनी से लज्जित कर दिया "इश्वर करे आपको बुढापे में हमारे खून से रंगे पैसों से  चैन की नींद आये " वकील यह सुन लज्जित हो गया ,एक खबर मिली की आपका प्यारा साथी अशफाकुल्ला खान जेल में बीमार हैं ,पुलिस आपको वहां ले गयी और आपको देखते ही अशफाकुल्ला की खान की बीमारी चली गयी ,ऐसे गाढ़ी थी आप दोनों की मित्रता , चंद्रशेखर आजाद ने आपको जेल से छुडाने की पूरी कोशिश की किन्तु सफल न हुए तो आपने उन्हें पत्र लिखा -
"मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या "
दिल की बर्बादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या "
जेल में आपने अपनी आत्मकथा लिखी ,किन्तु उसका क्या हुआ यह आज तक पता नहीं चल पाया | (किसी ने पता लगाने की आवश्कयता नहीं समझी )
फांसी से दो दिन पहले जब आपको दूध पीने को दिया गया तो आप ने हंस कर कहा की "मैं तो अब माँ का दूध ही पियूँगा"
फांसी से एक दिन पहले १८ दिसंबर को आपकी वीर माँ आपसे मिलने आयीं तो आप उन्हें देख कर रोने लगे ,माँ ने सख्ती से कहा " दधिची ,हरिश्चंद्र आदि पूर्वजों  की तरह धर्म और देश के लिए प्राण दे! ,तुझे शोक करने की कोई आवश्कयता नहीं ,आप हंस पड़े और बोले "माँ मुझे क्या पछतावा और क्या दुःख ? मैंने कोई अपराध नहीं किया किन्तु  जिस प्रकार अग्नि के पास रखा घी पिघल ही जाता है ,उसी प्रकार आपको देख कर मैं रोने लगा ,वरना माँ मैं तो बड़ा प्रसन्न हूँ "
१९ दिसंबर को गोंडा जेल में फांसी के फंदे पर जाते समय आप बड़े प्रसन्न थे ,फांसी के तख़्त पर आपने एक शेर पढ़ा ,वो इस प्रकार था -
"मालिक तेरी रजा रहे ,और तू ही तू रहे 
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे "
जब तक तन में सांस ,रगों में लहू रहे "
तेरा ही जिक्रेयार और तेरी जुस्तुजू रहे "
फिर आपने जोर से सिंह गर्जना की " आई विश डा डाउन फोल ऑफ़ ब्रिटिश एम्पयार " (मैं अंग्रेजी साम्राज्य का विनाश चाहता हूँ ")
फिर कुछ मन्त्र बुदबुदाये और वन्दे मातरम का उद्घोष किया 
और फिर आप इस लोक को छोड़ दुसरे राम के बैकुंठ लोक चले गए |
आपने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दिए किन्तु इस शर्मनिरपेक्ष इंडियन सरकार ने आपकी शहादत को क्या दिया -
भारत वर्ष का विभाजन और भ्रष्टाचार 
आपकी माँ के पास उनकी मृत्यु के समय फटे कपडे थे 
किन्तु हम अब ऐसा नहीं होने देंगे 
हम आपको न्याय दिलाएंगे 

यह हमारी भीष्म प्रतिज्ञा है !
वन्दे मातरम !

3 टिप्‍पणियां:

  1. राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत आपके लेख पठनीय व विचारणीय हैं. अपना पूरा परिचय प्रकाशित करें.
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  2. हरीश भाई..
    ये हैं यश पाण्डेय ..जिनकी पोस्ट आज BBLM पर लगायी थी मैंने,,
    बधाई यश ...लिखते रहो...आगे बढ़ो..

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  3. यश पाण्डेय जी नित नयी जानकारियां हमारे वीर पुरुषों की ला के एक नया अध्याय आप ने जो शुरू किया ज्ञानवर्धक है हमारे पाठकों को नित नूतन अच्छी जानकारियां मिलेंगी

    बधाई हो

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