शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

मेरी तेरी जीभ काटकर -अपनी दुनिया छाया होगा


‘युधिष्ठिर’ भी बहुत यहाँ हैं
‘शंख’  बजाने  वालों की भी
 नहीं कमी है
‘सच्चाई’ सब ‘दब’ जाती है
भीड़ मीडिया जुट जाती है
‘अश्वत्थामा’ जिन्दा हो भी
मर जाता है
और उनकी ‘प्रत्यंचा’
जो चढ़ी ‘धनुष’ पर
‘थम’ जाती है
ख़ुशी यही जो लड़ने आये
"आम' लोग सब बच जाते हैं
पैदल चलते भूखे प्यासे
‘धक्का खाते’ लोग हमारे
‘दो-चार किलो’ ही कम हो के
अपने घर फिर
बेचारे सब आ जाते हैं
‘जंग’ जीत के आये जैसे
 चौराहे दो-चार खड़े हो
‘ढोल’ बजा के
खेले ‘होली’
‘रंग’ जाते हैं
इसी बहाने आज -
‘मिले वो गले’ -
‘दर्द’-‘व्यथा’ सब कह जाते हैं
‘कैद’ उम्र भर ‘गाँव’ में अपने
जो रहते थे
शहर में ‘चींटी’ सा वे
चलते -फिरते
खिले फूल हैं- खुला आसमाँ
‘खजुराहो’ की देख दुकाने
मन ही मन में
तर जाते हैं
 कल कोई ‘कानून’ बनेगा
‘जनता’- रानी-
उसका प्यारा -"राजा" होगा
ले ‘नंगी’- ‘तलवार’
बहुत बहादुर’- सिंहासन’  पे
‘हावी’ होगा
कर लेगा दुनिया ‘मुट्ठी’ में
मेरी तेरी ‘जीभ –काटकर’
अपनी दुनिया छाया होगा
हम भी ‘गूंगे’ गुड खा -खा के
‘पांच’ साल तक नाचे जाएँ
गुड जो ‘रद्दी’ –‘कडवा’ होगा
कोई ‘कील’ सा ‘तिनका’ होगा
‘गले’ हमारे ‘फंसा’ रहेगा
‘मोती’ आँखों से गिर गिर के
किसी ‘आग’ में जलती होगी
कहें ‘भ्रमर’ मेरे सब भाई
‘’उंगली’ अपनी- अपनी ‘शक्ति’
सभी बचा लो     
‘मुट्ठी’ बाँध सकें जिससे हम 
‘चिट्ठी’ लिख ही उन्हें भिजा दें
 शुक्ल भ्रमर५
22.4.2011 जल पी. बी. 

3 टिप्‍पणियां:

  1. भ्रमर जी..
    आप ने एक नयी विधा ही बना डाली है घटनाओं को अपनी कविता से जोड़ने की..
    सिख रहा हूं लेखन में निखर लाना लानासे
    आभार

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  2. धन्यवाद हम आप के आभारी हैं हरीश भाई और आशुतोष जी -हाँ ये विधा बन गयी है ये दर्द हमारे समाज का अंतर्मन में -हमारे रग रग में छा चुका है जो तो उसकी परछाई तो पड़ेगी ही सब कुछ नया ले के आयें सब रंग मिलेंगे तभी तो गले मिल हम होली दिवाली मनाएंगे न आशुतोष जी सब अपने में अलग हैं उनकी पहचान उनकी अद्भुत क्षमता हमारे समाज का उत्कर्ष करती रहे बस -

    साधुवाद

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