शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

हे नारी तू पंगु बने ना


हे नारी तू पंगु बने ना
"कर' मजबूत तू अपनी लाठी 
जभी जरुरत तभी उठा ले 
कच्चा घड़ा है अभी बना ले
नरम है मिटटी मन का मोड़े 
गढ़ दे सुन्दर रूप !!
सोच सुनहरी सपने पहले 
मन में अपने खूब !
कलश बनाये मंदिर होगा 
मूरति शोभित वहीँ कहीं  
फूल बनाये मन मोहेगा
खुश कर सब को चले कहीं
प्याला 'वो' जो कहीं बनाये
मदिरालय में पड़े कहीं
कांटा जो बन गया कहीं तो
चुभे शूल सा जहाँ कहीं
दर्द व्यथा कुछ रक्त आह बस
गीत -न दिखती -हंसी कहीं
तू पारंगत नहीं अगर है
इस जुग की मूरति गढ़ने में
गढ़ दे कुछ भोली सी सूरति
मुस्काती हंसती सी मूरति
बाग-बगीचा वृन्दावन 
प्यार बरसता  जहाँ धरा पर
रास रचे -कान्हा -गोपी या
'लाल'- बहादुर -गाँधी से- रच दे
अमर शहीदों के कुछ रूप
गढ़ दे माँ बैठी तू धूप
अभी जलेगी तो पायेगी छाँव कभी
तेरे सपने इन मूरति में
जो भर पाए
जान जो आये
यही सहारा -तेरी "लाठी"
"कल' को ये -तू- भूल न जाये
हे माँ तू ममता की मूरति
इसके अन्दर ममता  भर दे
समता भर दे
प्यारा-न्यारा राग सभी !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
२३.४.२०११ जल पी.बी. 

5 टिप्‍पणियां:

  1. भ्रमर जी..नारी पर बड़ा वाद विवाद हो रहा है आज कल ब्लॉग जगत में ..
    आप की कविता बहुत सुन्दर और संबल है एक विशेष वर्ग के लिए..
    बहुत बहुत आभार सुन्दर लेखन...

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  2. आशुतोष भाई विवाद तो आज प्रायः हर मुद्दे पर ही आप को मिल जाएगा है न -हमें क्या चाहिए कौन सा पक्ष आप रख कर चलें क्या हमारा हित कर और अहितकर है सोच संभल कर चलना होगा -ये खुला पन यूरोप की संस्कृति अंधों सी न अपनाई जाएँ मुक्त रहें इसका मतलब इसका अर्थ अलग न लगाया जाये तो अच्छा होगा हमारी संस्कृति ये नहीं कहती मुखड़ा छुपाये रहो अशिक्षित रहो अंधकार में रहो -लेकिन ये जरुर कहती है हद में रहो -सीमा मत लान्घो रावण बैठा है ...
    धन्यवाद

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  3. रजनीश जी धन्यवाद इसे सही सोच मानने के लिए अच्छा हो की हम अच्छाई को गरिमा प्रदान करें कुतर्क कर अनायास ब्लॉग पर लोग लिखकर लोग माहौल बिगाड़ें नहीं बनाते रहें कोशिश जारी रखें

    भ्रमर५

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  4. हमारी संस्कृति ये नहीं कहती मुखड़ा छुपाये रहो अशिक्षित रहो अंधकार में रहो -लेकिन ये जरुर कहती है हद में रहो -सीमा मत लान्घो रावण बैठा है ...


    bahut sundar baat bata di aap ne...aabhar

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