बुधवार, 10 अगस्त 2011

दो अगीत.....ड़ा श्याम गुप्त....

       नगीना.....

तुम चाहे जितने गुणी हो,
कौन पूछता है;
किसी के खास बन् जाओ,
किसी की कालर से लटक जाओ,
तर जाओगे ;
महान होजाओगे,
अंगूठी में जड़ा ,
नगीना तो कहलाओगे |

मनुष्य  व पशु....

मनुष्य व् पशु में है-यही अंतर,
पशु  नहीं कर पाता,
छल-छन्द और जंतर-मंतर |
शैतान में पशु को -
माया संसार कहाँ दिखाया था,
ज्ञान का फल तो,
सिर्फ आदम ने ही खाया था |


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर गीत लिखा है...आभार !!
    मेरा आपसे निवेदन है कि 16 अगस्त से आप एक हफ्ता देश के नाम करें, अन्ना के आमरण अनशन के शुरू होने के साथ ही आप भी अनशन करें, सड़कों पर उतरें। अपने घर के सामने बैठ जाइए या फिर किसी चौराहे या पार्क में तिरंगा लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाइए। इस बार चूके तो फिर पता नहीं कि यह मौका दोबारा कब आए।

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  2. सर बहुत ही सुन्दर ! नगीना को किसी ने भी नहीं गिना !

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