रविवार, 17 जुलाई 2011

दो अगीत.....ड़ा श्याम गुप्त....

      १. महंगाई ....
मंहंगाई अपने ही तो बुलाई ,
चाहते हैं-  शानदार ,  इम्पोर्टेड -
चमकीला  खरीदना ;  जो-
महंगे से महंगा हो ,
और एसी शापिंग माल में टंगा हो ;
जिसमें हों स्वचालित सीडियां लगाईं ,
महंगाई तभी तो आई ||

        २. सत्संग ...
सत्संग,
एक खरल की भांति है , जो-
व्यक्ति को, प्रेम व भक्ति के भावों से ,
धर्म और ज्ञान के विभावों से ,
रगडता है, और -
बनादेता है,
शुद्ध सरल सत्व - तत्व-सार ,
आत्म-तत्व को परम-तत्व में ,
योग के लिए तैयार |

4 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी गहरी और सामयिक बात कह दी आपने।
    ...... आभार

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  2. शानदार अगीत ||
    दोनों दमदार |

    बहुत-बहुत बधाई ||

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  3. बहुत सुन्दर रचना..
    हमारी इच्छाएं भी महंगाई का कारण हैं..

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  4. ---सही कहा आशुतोष...इच्छाएं ही महंगाई का कारण हैं...
    ---धन्यवाद मदन शर्मा जी व रविकर जी....

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