अगर आपको कुछ दिनों से खांसी आ रही है, भूख नहीं लगती, लगातार आपका वजन कम होता जा रहा है .तो इसे नजरअंदाज बिल्कुल मत करिए क्योंकि ये किसी बड़ी बीमारी की दस्तक हो सकती है. हम बात कर रहे हैं टीबी की जो जानलेवा भी हो सकती है। टीबी एक संक्रामक बीमारी है जो बीमार व्यक्ति से सेहतमंद लोगों में भी फैल सकती है।
खांसी. देखने में आम है लेकिन लगातार 3 हफ्ते से अधिक खांसी है तो सावधान, ये टीबी यानी ट्यूबरक्लोसिस की बीमारी की शुरुआत हो सकती है। ये एक ऐसा संक्रामक रोग है, जो माइको बेक्टीरियम ट्यूबरक्लोई नामक बैक्टेरिया की वजह से होता है। यह बैक्टीरिया शरीर के सभी अंगों में प्रवेश कर रोग ग्रसित कर देता है। ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है। लेकिन इसके अलावा आंतें, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा, हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं… ये अगर किसी को हो जाए तो उससे दूसरे को होना भी लाजमी है। इसके बैक्टेरिया तेजी से फैलते हैं। टीबी रोगियों के कफ, छींकने, खांसने, थूकने और छोड़े गए सांस से हवा में बैक्टीरिया फैल जाते हैं। जिसकी वजह से स्वस्थ व्यक्ति भी आसानी से इसका शिकार हो सकता है। संक्रमित व्यक्ति के कपड़े छूने या उससे हाथ मिलाने से टीबी नहीं फैलता। टीबी बैक्टीरिया सांस के जरिए फेफड़े तक पहुंचता है तो वह कई गुना बढ़ जाता है और फेफड़ों को प्रभावित करता है। हालांकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इसके बढ़ते प्रभाव को रोकने में मदद करती है, लेकिन जैसे-जैसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती जाती है, टीबी के संक्रमण की आशंका बढ़ती जाती है। इस बीमारी के तीन स्टेज होते हैं, पहली अवस्था में पसलियों में दर्द, हाथ-पांव में अकड़न, पूरे शरीर में हल्की-सी टूटन और लगातार बुखार बना रहता है। .इस अवस्था में रोग के एहसास या उसके होने का ठीक से पता नहीं लगाया जा सकता। दूसरी अवस्था में रोगी की आवाज मोटी हो जाती है, पेट दर्द की समस्या होती है, कमरदर्द, बुखार आदि के लक्षण प्रकट होते हैं। इस अवस्था में अगर रोग का पता लग जाए तो सहज रूप से इसका इलाज हो सकता है। तीसरी अवस्था में रोगी को तेज बुखार होता है, तेज खांसी होती है जो उन्हें बहुत ज्यादा परेशान करती है। कफ के साथ सामान्य खांसी और खांसी के साथ खून भी आता है। यह स्थिति गंभीर मानी जाती है।
इस बीमारी की दस्तक अक्सर खामोश होती है, इसके लक्षण आम बीमारी की ही तरह होते हैं। जिसे लोग हल्के में लेते हैं, जिसके परिणाम बेहद भयावह हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी है कि शुरूआत में ही इस बीमारी के लक्षणों की पहचान हो सके, तो जानते हैं कि क्या हैं इस बीमारी के आम लक्षण।
टीबी के आम लक्षण-
तीन सप्ताह से अधिक खांसी
बुखार जो खासतौर पर शाम को बढ़ता है।
छाती में दर्द
वजन का घटना
भूख में कमी
बलगम के साथ खून आना
फेफड़ों का इंफेक्शन बहुत ज्यादा होना
सांस लेने में दिक्कत
देश में ये बीमारी तेज़ी से अपने पैर पसार रही है, जिससे रोजाना बड़ी तादाद में मौतें भी होती हैं…हांलाकि ये बीमारी जानलेवा है…लेकिन कभी लाइलाज होने वाली ये बीमारी अब लाइलाज नहीं रह गई है। इसका इलाज संभव है, लेकिन जरूरत है कि इस बीमारी का वक्त रहते पूरा इलाज किया जाए।
भारत में रोज लगभग 4 हजार लोग टीबी की चपेट में आते हैं और 1000 मरीजों की इस बीमारी की चपेट में आने से मौत हो जाती है। कभी लाइलाज रही टीबी का आज इलाज संभव है। 24 मार्च 1882 को सर रॉबर्ट कॉक ने सबसे पहले टीबी के बैक्टीरिया के बारे में बताया था इसलिए इस दिन टीबी दिवस मनाते हैं। टीबी कोई आनुवांशिक रोग नहीं है। ये कभी भी किसी को भी हो सकता है। ये एक संक्रामक रोग है जिससे छुटकारा पाने का तरीका इसका पूरा इलाज है। अगर इसका पूरा इलाज न किया जाए तो इस रोग को कभी खत्म नहीं किया जा सकता है और व्यक्ति की मौत हो जाती है। भारत सरकार के डॉट्स केन्द्र देश भर में हैं जहां टीबी के इलाज की नि:शुल्क व्यवस्था है। जरूरत है तो बस पूरे इलाज की, आमतौर पर देखने को मिलता है कि जब लोग थोड़ा ठीक महसूस करने लगते है…तो या तो वो लापरवाही बरतने लगते हैं या फिर इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं। जिससे ये बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाती है, इसलिए डॉक्टर के मुताबिक पूरा इलाज करना चाहिए। इस बीमारी के इलाज के साथ साथ खाने-पीने का भी पूरा ख्याल रखना चाहिए। टीबी के मरीजों को संतुलित आहार के साथ हाई प्रोटीन डाइट लेना जरूरी होता है। खाने के मामले में किसी तरह का कोई परहेज नहीं होता। बस आहार पौष्टिकता से भरपूर होना चाहिए। दूध, अंडे, मुर्गा, मछली आदि में बेहतर प्रोटीन होता है। इसलिए मरीजों को भोजन के रुप में इसे ही यूज करना चाहिए। इसके अलावा लौकी, तुलसी, हींग, आम का रस,अखरोट, लहसुन, देसी शक्कर, बड़ी मुनक्का, अंगूर भी बहुत फायदेमंद साबित होते हैं। अगर एक सामान्य व्यक्ति को एक ग्राम प्रोटीन डाइट की सलाह दी जाती है तो टीबी के मरीज को 1.5 ग्राम प्रोटीन की सलाह दी जाती है।
टीबी संक्रमक बीमारी है इसलिए इससे बचाव बेहद जरूरी है…कैसे करें इस बीमारी से बचाव ये जानते हैं।
टीबी से बचाव-
बच्चों को जन्म से एक माह के अंदर टीबी का टीका लगवाएं।
खांसते -छींकते समय मुंह पर रुमाल रखें।
रोगी जगह-जगह नहीं थूकें।
पूरा इलाज कराएं।
अल्कोहल और धूम्रपान से बचें।
पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा प्रकाशित “ग्लोबल टीबी कंट्रोल रिपोर्ट 2011”के मुताबिक इस साल 90 लाख टीबी रोगी में से 10% से 15% टीबी रोगी 14 साल और उससे कम उम्र के बच्चे हैं जिनको इलाज की ज़रूरत होगी। बच्चो में टीबी संक्रमण का एक प्रमुख कारण बड़ों की टीबी है, इसलिए बच्चों में टीबी संक्रमण को रोकने के लिए परिवार के सदस्यों और अभिभावकों को टीबी के बारे में जानकार होना बहुत ज़रूरी है। बच्चों में टीबी कई तरह से हो सकती है जैसे प्रायमरी कॉम्प्लेक्स, बाल टीबी, प्रोग्रेसिव प्रायमरी टीबी, मिलियरी टीबी ,दिमाग की टीबी, हड्डी की टीबी । साधारण तौर पर बच्चों में प्रायमरी कॉम्प्लेक्स होता है। इस बीमारी से बार-बार बुखार आना, लंबे समय तक खाँसी होना, वजन न बढ़ना या वजन घटना, सुस्त रहना, गर्दन में गठानें होना, प्रोग्रेसिव प्रायमरी टीबी में बच्चा ज्यादा बीमार रहता है। तेज बुखार आना, भूख न लगना, खाँसी में कफ आना और छाती में निमोनिया के लक्षणों का पाया जाना। बड़े बच्चों में कभी-कभी कफ में खून भी आता है। जबकि मिलियरी टीबी एक गंभीर किस्म की टीबी है। यह फेफड़ों में सारी जगह फैल जाती है। इसमें बच्चा गंभीर रूप से बीमार रहता है, खाना-पीना छोड़ देता है, सुस्त रहता है, साँस लेने में तकलीफ होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से बेहोशी छाने लगती है। दिमाग की टीबी मेनिनजाइट्सि के रूप में या गठान के रूप में हो सकती है। इसके अलावा सिरदर्द होना, उल्टियाँ होना, झटके आना या बेहोश हो जाना साधारणतया दिमागी टीबी की ओर इशारा करते हैं। टीबी से ग्रसित बच्चों में प्रायः कुपोषण और एनीमिया पाया जाता है। पौष्टिक और संतुलित आहार इलाज में सहायक होता है। बीसीजी का टीका लगवाने से गंभीर किस्म की टीबी से बचा जा सकता है।
गुरुवार, 12 अप्रैल 2012
मंगलवार, 3 अप्रैल 2012
जीव-जंतु
गायब होते गिद्ध

मुझे अच्छी तरह याद है, अभी कुछ ज्यादा अरसा भी नहीं गुजरा है गिद्ध बड़ी आसानी से दिखाई देते थें मगर आजा हालात बदल गये हैं, अब ढ़ूढ़ने से भी नहीं दिखते। हमारे घर के पीछे एक बड़ा तालाब है, जिसे गांव वाले न जाने क्यूं खरगस्सी कहतेे हैं वहीं ताड़ के दर्जन भर पेड़ कतारबद्ध खड़े हैं। गवाह हैं ताड़ के वे पेड़ जो कभी गिद्धों का आषियाना हुआ करते थें। अक्सर षाम के वक्त डरावनी आवाजें ताड़ के पेड़ों से आती मानों कोलाहल सा मच जाये। मालूम हो जैसे रनवे पर जहाज उतर रहा हो। मगर अब वो दिन नहीं रहे। आज एक भी गिद्ध नहीं बचा। लगभग ऐसे ही हालात अन्य जगहों के भी हैं।
गिद्ध प्रकृति की सुन्दर रचना है, मानव का मित्र और पर्यावरण का सबसे बड़ा हितैशी साथ ही कुदरती सफाईकर्मी भी। मगर आज इनपर संकट का बादल मंडरा रहा है। हालात अगर इसी तरह के रहें तो अनकरीब गिद्ध विलुप्त हो जायेंगे। एक वक्त था कि मुल्क में गिद्ध भारी संख्या में पाये जाते थे। सन् 1990 में गिद्धों की संख्या चार करोड़ के आसपास थी। मगर आज यह घटकर तकरीबन दस हजार रह गयी है। सबसे दुःखद पहलू यह है कि मुल्क में बचे गिद्धों की संख्या लगातार तेजी से घट रही है। वैसे तो गिद्ध मुल्कभर में पाये जाते हैं मगर उत्तर भारत में इनकी संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है। भारत में व्हाइट, बैक्ड, ग्रिफ, यूरेषियन और स्लैंडर प्रजाति के गिद्ध पाये जाते हैं।
गिद्धों का प्रमुख काम परिस्थितकी संतुलन को बनाये रखना है। मुल्क के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में मृत पषुओं को खुले मैदान में छोड़ दिया जाता है। जहां गिद्धों का झुण्ड कुछ ही देर में उसका भक्षण करके मैदान साफ कर देते हैं। मृत जानवरों का मांस ही गिद्धों का प्रमुख भोजन है।
पशु वैज्ञानिकों का मानना है कि गिद्ध हजार तरह के भयंकर बीमारीयों से बचाव में अहम भूमिका निभाते हैं। वैसे तो गिद्ध मानव के साथी हैं मगर मानवीय लापरवाही की वजह से इनके अस्तित्व पर संकट मण्डराने लगा है। आखिर क्या वजह है कि मुल्क में अचानक गिद्धों की संख्या इतनी कम हो गई ? अगर गौर फरमाया जाए तो गिद्धों के खात्मे के लिए अनेक वजह हैं मगर पषुओं के इलाज में डाइक्लोफिनाक का इस्तेमाल प्रमुख कारण है। असल में डाइक्लोफिनाक दर्दनाशक दवा है जोकि पशुओं के इलाज में काफी कारगर है। अगर इलाज के दौरान पशुओं की मौत हो जाती है तो उसे गिद्ध खाते हैं जिससे गिद्धों के शरीर में डाइक्लोफिनाक पहुंच जाता है। डाइक्लोफिनाक की वजह से गिद्धों के शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है, गिद्ध इसे मूत्र के द्वारा षरीर से बाहर नहीं निकाल पाते जिससे उनकी किडनी खराब हो जाती है जो उनके मौत की जिम्मेदार बनती है।
वैश्विक स्तर पर गिद्धों की घटी संख्या पर चिंता जताई जा रही है। कई मुल्कों ने तो डाइक्लोफिनाक पर रोक लगा रखा है। भारत में गिद्धों की घटती संख्या के लिए डाइक्लोफिनाक को जिम्मेदार माना जा रहा है। भारत सरकार ने भी डाइक्लोफिनाक का पशुओं पर इस्तेमाल प्रतिबंधित कर रखा है। गिद्धों की घटती संख्या पर सरकार भी काफी चिंतित है इसलिए इनके संरक्षण व प्रजनन के लिए कई योजनाएं चलायी जा रही हैं। जिसमें विदेषों से भी मद्द मिल रहा है। ब्रिटिष संस्था रायल सोसाइटी आफ बर्ड प्रोटेक्शन ने इंडो-नेपाल बार्डर को ‘‘ डाइक्लोफिनाक फ्री जोन ’’ बनाने का बीड़ा उठाया है। जिसमें भारत व नेपाल की सरकारें सहयोग करेंगी। इस योजना के तहत दो किलोमीटर तक क्षेत्र को 2016 तक डाइक्लोफिनाक मुक्त करने का प्लान है। इसके लिए उत्त्र प्रदेष में पांच जोन बनाये गये हैं, जिसमें पीलीभीत-दुधवा क्षेत्र, बहराईच का कतरनिया घाट प्रभाग, बलरामपुर का सोहेलवा और महाराजगंज जिले का सोहागी बरवा क्षेत्र शामिल है।
तेजी से विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के लिए सरकार देष में तीन गिद्ध संरक्षण प्रजनन केन्द्र चला रही है, जो पिंजौर हरियाणा, राजाभातखावा पष्चिम बंगाल व रानी असम में स्थापित हैं। मगर ये सभी योजनाएं गिद्धों को बचाने में नाकाफी साबित हो रही हैं। जंगल के इस सफाईकर्मी की घटती संख्या से वन्य जीवों समेत मानव की जान पर खतरा मंडराने लगा है, जिससे वाइल्ड लाइफ प्रेमी काफी चिंतित हैं। मुल्क के शहरी व ग्रामीण इलाकों में अगर गिद्धों की चहल-पहल देखनी है तो इनके संरक्षण के लिए हमें आगे आना होगा। नही तो मानव का सच्चा हितैषी विलुप्त हो जाएगा और हमें तरह-तरह की भयंकर बीमारियों से दो चार होना पड़ेगा। जिसके लिए हम खुद जिम्मेदार होंगें।
एम. अफसर खां सागर
यहीं खिलेंगे फूल
यहीं खिलेंगे फूल
——————–
क्या सरकार है कैसे मंत्री
काहे का सम्मान ??
भिखमंगे जब गली गली हों
भ्रष्टाचारी आम !
——————————
माँ बहनें जब कैद शाम को
भय से भागी फिरतीं
थाना पुलिस कचहरी सब में -
दिखे दु:शासन
बेचारी रोती हों फिरतीं
——————————-
बाल श्रमिक- होटल ढाबों में
मैले –कुचले- भूखे -रोते
अधनंगे भय में शोषित ये
बच्चे प्यारे वर्तन धोते
——————————
इंस्पेक्टर लेबर आफीसर
बैठ वहीं मुर्गा हैं नोचे
खोवा दूध मिलावट सब में
फल सब्जी सब जहर भरा
खून पसीने के पैसे से
क्यों हमने ये तंत्र रचा ??
———————————–
जिसकी लाठी भैंस है उसकी
लिए तमंचा गुंडे घूमें
चुन -चुन हमने- बेटे भेजे
जा कुछ रंग दिखाए
नील में –गीदड़- जा रंगा वो
कठपुतली बन नाचे जाए
———————————
गली -गली जो गला फाड़ते
बदलूँ दुनिया कल तक बोला
मिट्ठू मिट्ठू जा अब बोले
कभी बने बस -भोला-गूंगा
——————————
रिश्ता नाता माँ तक भूला
कैसा नामक हराम !
पढ़ा पढाया गुड गोबर कर
देश न आया काम !
मुंह में राम बगल में छूरी
क्या दुनिया – हे राम !
किस पर हम विस्वास करें हे
नींदे हुयी हराम !
—————————–
आओ भाई सब मिल करके हम
अपना बोझ उठायें
जो हराम की खाएं उनसे
सब हिसाब ले आयें
——————————–
वीर प्रतापी जनता सारी
तुम सब ही हो सच्चे राजा
कर बुलंद आवाजें अपनी
देखो कैसे जग थर्राता
सहो नहीं हे सहो नहीं तुम
एक बनो सब -सच्चे-भ्राता
——————————-
जो काँटा बोओ -पालोगे
यही गड़ें- बन शूल
कहें “भ्रमर” -सूरज- हे निकलो
करो भोर हे ! समय अभी अनुकूल
करो सफाई घर घर अपने
काँटा फेंको दूर
चैन से कोमल शैय्या सो लो
यहीं खिलेंगे फूल

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क्या सरकार है कैसे मंत्री
काहे का सम्मान ??
भिखमंगे जब गली गली हों
भ्रष्टाचारी आम !
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माँ बहनें जब कैद शाम को
भय से भागी फिरतीं
थाना पुलिस कचहरी सब में -
दिखे दु:शासन
बेचारी रोती हों फिरतीं
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बाल श्रमिक- होटल ढाबों में
मैले –कुचले- भूखे -रोते
अधनंगे भय में शोषित ये
बच्चे प्यारे वर्तन धोते
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इंस्पेक्टर लेबर आफीसर
बैठ वहीं मुर्गा हैं नोचे
खोवा दूध मिलावट सब में
फल सब्जी सब जहर भरा
खून पसीने के पैसे से
क्यों हमने ये तंत्र रचा ??
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जिसकी लाठी भैंस है उसकी
लिए तमंचा गुंडे घूमें
चुन -चुन हमने- बेटे भेजे
जा कुछ रंग दिखाए
नील में –गीदड़- जा रंगा वो
कठपुतली बन नाचे जाए
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गली -गली जो गला फाड़ते
बदलूँ दुनिया कल तक बोला
मिट्ठू मिट्ठू जा अब बोले
कभी बने बस -भोला-गूंगा
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रिश्ता नाता माँ तक भूला
कैसा नामक हराम !
पढ़ा पढाया गुड गोबर कर
देश न आया काम !
मुंह में राम बगल में छूरी
क्या दुनिया – हे राम !
किस पर हम विस्वास करें हे
नींदे हुयी हराम !
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आओ भाई सब मिल करके हम
अपना बोझ उठायें
जो हराम की खाएं उनसे
सब हिसाब ले आयें
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वीर प्रतापी जनता सारी
तुम सब ही हो सच्चे राजा
कर बुलंद आवाजें अपनी
देखो कैसे जग थर्राता
सहो नहीं हे सहो नहीं तुम
एक बनो सब -सच्चे-भ्राता
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जो काँटा बोओ -पालोगे
यही गड़ें- बन शूल
कहें “भ्रमर” -सूरज- हे निकलो
करो भोर हे ! समय अभी अनुकूल
करो सफाई घर घर अपने
काँटा फेंको दूर
चैन से कोमल शैय्या सो लो
यहीं खिलेंगे फूल

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.४.१२ कुल्लू यच पी
७-७.३९ पूर्वाह्न
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.४.१२ कुल्लू यच पी
७-७.३९ पूर्वाह्न
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
सोमवार, 2 अप्रैल 2012
यूथ
रीतेश तोमर : भाजपा का युवा चेहरा

रीतेश तोमर भारतीय जनता पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं। छात्र जीवन से राजनीति में कदम रखने वाले रीतेष अपने जुझारू व्यक्तित्व के बल पर भाजपा में विभिन्न पदों पर रहते हुए आज ह्यूमन राइट सेल में रा0 एक्जीक्यूटिव मेम्बर हैं साथ ही दिल्ली भाजपा के संवाद सेल में सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहे हैं। इनका जन्म 9 अक्टूर 1984 को मेरठ के मुण्डाली गांव में हुआ। शुरूवाती शिक्षा मेरठ में हुई उसके बाद नोएडा से बी. टेक किया। इनका बचपन संघ के गोद में बीता तथा 2004 से भारतीय जनता युवा मोर्चा के सक्रीय सदस्य के रूप में पार्टी के लिए काम किया। फ्रैंस आफ बीजेपी के बैनर तले पूरे भारत में मूहीम चलया गया जिसमें रीतेष ने सम्पूर्ण उत्तर प्रदेष में सम्मेलन कर युवाओं को भाजपा से जोडने का सफल प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के विधासभा चुनाव में भी रीतेश ने मेरठ, गाजियाबाद, मुरादाबाद, नोएडा, वाराणसी समेत विभिन्न जगहो पर भाजपा के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया।
रीतेश का मानना है कि जरूरतमन्दों और गरीबों की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। इनकी सेवा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है तथा मन को शान्ति मिलता है। मेरा प्रयास रहता है कि हर उस व्यक्ति के मदद के लिए पहुंचू जो परेशान और गरीब है। इसीलिए तो इन्होने मेरठ, नोएडा व गेटर नोएडा समेत विभिन्न क्षेत्रों में गरीबों में कम्बल, साडी व दवा मुफत वितरित करवाया। समय-समय पर ये गरब बस्तियों में मेडिकल कैंप का आयोजन करवातें हैं।
देषभक्ति के जज्बे से लबेरेज रीतेष भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मुहीम छेड चुके हैं। भाजपा का उभरता युवा चेहरा रीतेश की सोच भारत को बुनन्दियों पर ले जाने वाली है। तकनीकी शिक्षा में निपुण यह युवा अपने साथ हजारों युवाओं का काफीला लेकर चल रहा है जिसके जीवन का उददेश्य भारत की तस्वीर के साथ तकदीर बदलने वाली है। फिल्वक्त रीतेश दिल्ली एमसीडी चुनाव में भाजपा के लिए धुआंधार प्रचार कर रहे हैं, इनकी सभाओं में युवाओं का रेला उमड रहा है।
रविवार, 1 अप्रैल 2012
झरना से सरिता बन जाऊं
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प्रभु जी मैंने पाल राखी है ज्योति पुंज की आशा
दुर्बल मूढ़ इतै उत भटकूँ ना समझूँ परिभाषा
तन का मन का निज का उस का सुख क्या किसका अच्छा ??
अच्छा सच्चा यदि ये कहिये उसको वो क्यों अच्छा ??
है आनंद रूप प्रभु तेरा तो वो नित तो पाता
फिर अनुचित कह जग रोता क्यों तुझ को भी ना भाता
स्वार्थ लिप्त तो सब ही दीखें कारण वश वो करता
काल नियंत्रक कारण जन क्यों अग्नि परीक्षा करता ??
है प्रकाश ही चरम विन्दु तो काली रात यहाँ क्यों आती
निर्बल दुखियारों को ही क्यों फिर आंधी रही उड़ाती ??
कल के सपनों की खातिर कुछ मोती रोज पिरोता
गूंथ न पाया माला प्रभु में झर -झर रह गया रोता
दिव्य दृष्टि तेरी तो प्रभुवर गुरु बन जा दे शिक्षा
खांई कहाँ ? कहाँ पथ दुर्गम आहट -दे -ये भिक्षा
कर्म लीन तो हूँ मै भी फल से विरत कहो कैसे हूँ
सत्कर्मों का फल त्यागूँ जो दुष्कर्मों का दोषी क्यों हूँ ?
सुख में दुःख में सब में समता रखता फिर भी अलग पड़ा
ऊँच नीच हर भेद भाव सब मेरे मत्थे यहीं जड़ा
मै अबोध -बालक हूँ अब भी कोरा मन है मेरा
चला मिटाता लिक्खा जग का प्रभु अब लिख तू तेरा
निर्मल जल सा होए जीवन सींचे तृप्त किये सुख पाऊँ
गड़ही - में बस सडू नहीं मै झरना से सरिता बन जाऊं !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
1.04.2012
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