सोमवार, 28 मार्च 2011

मैं भीष्म हूँ

मित्रों सोच रहा था लेख से ब्लॉग पर कुछ लिखना शुरू करूँ या कविता से...क्यूकी कविता मेरी प्रेरणा है और लेख मेरा सामर्थ्य..
तो सोचा शुरुवात भावना से करता हूँ...इसी कविता से ब्लॉग लिखना भी शुरू किया था मैंने..शायद हमारे पूर्वांचल पर भी सटीक है ये कविता...हमारा पूर्वांचल भी भीष्म जैसा ही है अपनों के शर से बिंध हुआ शर शय्या पर पड़ा हुआ.......
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मैं भीष्म हूँ
त्याग की प्रतिमूर्ति,
प्रतिज्ञा का पर्याय,

शर शैया पर पड़ा हूँ
,


बाणों से बिंधा हुआ,
उस युग मे भी..
इस युग मे भी..
ये सारे शर,मेरे प्रिय के हैं,
प्रिय पुत्र अर्जुन के...


जिनका संधान सिखा था उसने,
अनवरत मेरी साधना से,
गुरु द्रोण की तपस्या से..

लेकिन कही नहीं था शामिल,
मेरे साधना में..या द्रोण की तपस्या में,
धर्म की रक्षा के लिये,
अधर्म को अपनाना
भीष्म को जितने के लिये
शिखंडी को कवच बनाना

लेकिन ये उपाय भी तो मैने ही बताया है..
धर्म की रक्षा के लिये,
इच्छा मृत्यु का वरदान गंगा से,
मैने ही तो पाया है.....

वो एक महाभारत था,
हर युग मे महाभारत होगा,
मगर,
मै भीष्म डर रहा हू आज,
सूर्य के उतरायण होने से..
मुझे मृत्यु का किंचित भय नहीं है...
मगर,
सूर्य उतरायण हुआ तो,
अब शिखंडियो की फ़ौज से कौन टकराएगा,
अगर मैने ये शारीर छोड़ दिया तो,
अर्जुन को विजय कौन दिलाएगा..
क्या इस युग मै भी
कोई गंगा से इच्छा मृत्यु का वरदान पायेगा???
मैं भीष्म हूँ...........



."आशुतोष नाथ तिवारी"

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