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मंगलवार, 28 जून 2011

जैसे थे......कविता .....ड़ा श्याम गुप्त ...

पहले जर जोरू ज़मीन पर -
झगड़े होते थे;
और  खानदानी रंजिश के ,
बीज बोते थे |
पूरे के पूरे घर,कुटुंब, गाँव-
के सफाए होते थे |
खेतों खलिहानों में कभी कभी-
वलात्कार भी होते थे ||

आज हम लंगोटी की जगह,
सूट पहनने लगे हैं,
तीर तलबार की जगह ,
बन्दूक रखने लगे हैं |
झोंपडी की जगह-
अट्टालिकाओं में रहने लगे हैं |
टाटा सफारी क्वालिस व सेंट्रो कार में
चलने लगे हैं |
अतः ह्त्या व वलात्कार -
राह चलते होने लगे हैं ||

हमने  बहुत प्रगति की है ,
यह सही है ;
पर मन से व कर्म से,
लगता है, हम वहीं हैं;
वहीं के वहीं हैं ||