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गुरुवार, 26 मई 2011

जड विहीन...डा श्याम गुप्त....

 (अगीत छंद )

मैं बुरा न बन पाया,
अत: बदनाम हूं ।
बदनीयत नहीं बन पाया,
नाम हीन हूं ।
भ्रष्टाचार की दिशा तय नहीं करपाया,
दिशा हीन हूं ।
प्रोटोकोल नहीं निभा पाया,
अनुशासन हीन हूं ।
क्योंकि मेरी पीठ पर किसी का हाथ नहीं है,
मैं जड विहीन हूं ॥