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सोमवार, 24 अगस्त 2020

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood

Bhai-Chara-Brother-Hood

Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


Bhai Chara / भाईचारा / Brother Hood


क्या गजब है देशप्रेम,
क्या स्वर्णिम इतिहास हमारा है|
अजब-गजब कि मिलती मिसालें,
क्या अद्भुत भाईचारा है||

जब भी दुश्मन आता सरहद पर,
हमें देशप्रेम बुलाता है|
माँ भारती कि आन-बान को,
हर भारतवासी मर-मिट जाता है||

जब सैनिक भारत माँ कि रक्षा को,
सीने पर गोली खाता है|
हर भारतवासी के सीने को,
वो लहूलुहान कर जाता है||

जब जब आई है विपदा हम पर,
हम कंधे से कंधा मिलाते है|
हम भारत माँ और उन वीर सपूतो के,
वंदन को शीश झुकाते है||

वीर सपूतो के बलिदानों पर,
हर भारत वासी हारा है|
हम माँ भारती कि संताने है,
और हिंदुस्तान हमारा है||

क्या अद्भुत भाईचारा है||



ऋषभ शुक्ला

Hindi Kavita Manch / हिंदी कविता मंच

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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

who is guilty?

कसूरवार कौन ? 


बात तब की है जब मै सिर्फ १२ साल का था | मै अपने जन्म स्थान, उत्तरप्रदेश के भदोही जिले में अपने माता-पिता के साथ रहता था | वही भदोही जो अपने कालीन निर्यात के लिए विश्व विख्यात है | मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है, जहाँ मेरे दादाजी अपने दो भाइयों और उनके पुरे परिवार के साथ रहते है | और मै खुद को इसीलिए सौभाग्यशाली समझता हूँ, और पुरे परिवार के साथ बिताये गए वो पल मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और ताउम्र यादगार रहने वाले पल थे | मेरे दादाजी मुझसे बहुत स्नेह करते थे और एक वही थे जिनसे मै हठ करके अपनी बात मनवा लेता था | वे मुझे प्यार से ''बऊ'' बुलाते थे | मै हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभी जिद करके साईकिल से बाजार जाकर घर के लिए कुछ सामान ला लेता था | लेकिन उसके पीछे मेरा एक स्वार्थ छुपा हुआ था, जिस रहस्य को मै और मेरे दादाजी के सिवाय कोई नहीं जानता था, जब मै सामान लेन की जिद करता तो पहले तो दादाजी मनाकर देते लेकिन मेरे बालहठ के आगे वे भी कितने देर टिक पाते, और अंत में मुस्कुराते हुए मुझे पैसे देते हुए प्यार से कहते  - '' ठीक है चले जाओ, लेकिन संभल के जाना |''
और जब मै पैसे देखता तो उसमे सामान की तुलना में ज्यादा पैसे हुआ करते थे |

एक दिन मै सुबह उठा तो हल्की-हल्की  ठंढ लग रही थी, और मै घर के दरवाजे के पास बैठा था कि अचानक हल्के स्वर में पीछे से दादाजी की आवाज सुनायी दी - '' बऊ ! ''
मै अंदर गया तो अपने कमरे में लेते हुए थे | अंदर जाते ही उन्होंने मुझे पैसे देते हुए कहा - ''बाजार जाकर मेरा बिस्कुट लेकर आओ |''

मैंने पैसे लिए और जाने की लिए मुड़ा ही था की हमेशा की तरह उन्होंने हिदायत देते हुए कहा - ''आराम से जाना, और जल्दी वापस आ जाना |''

मैंने भी बिना उनकी तरफ देखे स्वीकृति से अपना सर हिला दिया | और सायकिल पर सवार होकर बाजार कि तरफ निकल पड़ा.

मैने बाजार पहूचकर जल्दी-जल्दी सामान लिया और वापस लौटने के लिए साइकिल उठायी ही थी की अचानक ही मेरा ध्यान सड़क के किनारे खड़ी एक महिला पर पड़ी, पास जाकर देखा तो अरे ये क्या यह तो रुक्मिणी बुआ है| इनकी हमारे गाँव मे एक छोटी सी दुकान है, और वे हमेशा पैदल ही बाजार जाकर समान लाती थी| लगता है आज उनका सामान का थैला कुछ ज़्यादा वज़नदार हो गया था जिसकी वजह से वे उसे नही ले जा पा रही थी| मैंने देखा तो वे मुझे ही देख रही थी, और वे मुझसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन कह नहीं पा रही थी । मुझे जल्दी थी, लेकिन मै खुद को रोक नहीं सका, और पास जाकर पूछा - '' क्या हुआ बुआ ?''

उन्होंने सकुचाते हुए कहा - ''नहीं....... कु........ कुछ नहीं ।''

लेकिन मेरे जोर देने पर उन्होंने बताया - '' सामान लेने आयी थी, लेकिन वजन ज्यादा होने के कारण नहीं ले जा पा रही हूँ ।''

तो मैंने कहा - ''ठीक है, मै लिए चलता हूँ ।''

तो वह मना करने लगी, लेकिन इससे पहले की वह कुछ बोल पाती मैंने उनका झोला (बैग) अपने केरियर (सायकिल का पिछला हिस्सा, जो वजनी सामान ढोने के काम में आता है) पर रख लिया। तो वह भी मान गयी और हम दोनों पैदल ही घर की तरफ चल दिये। हमारे घर से बाजार की दूरी तकरीबन दो किलोमीटर थी, इसीलिए पहुचने में लगभग एक घंटे का समय लग गया। और इस चक्कर में मै यह भूल गया की मुझे घर जल्दी जाना था। हम घर के करीब ही थे की सामने से छोटे चाचाजी आते दिखाई दिए।
और पास आकर उन्होंने पूछा - '' इतनी देर कैसे हो गयी ?, और पैदल क्यों आ रहे हो ?''

इससे पहले की मै कुछ बोल पाता, उन्होंने फिर क्रोधित होते हुए पूछा - ''यह सामान किसका है ? '' 

तो मैंने बताया की सामान तो रुक्मिणी बुआ का है और मेरे कुछ और बोलने से पहले ही वह बुआ पर बिफर पड़े। उन्होंने कहा - ''तुम्हे इतनी भी समझ नहीं है, इस छोटे से बच्चे के ऊपर इतना सामान लाद दिया है ।''

और इतना कहकर उन्होंने रुक्मिणी बुआ का सारा सामान निचे फेक दिया, जो पुरे सड़क पर बिखर गया। मैंने चाचाजी को समझाने और रोकने की पूरी कोशिस की लेकिन उन्होंने मुझे डाँटकर चुप करा दिया, चुपचाप घर जाने के लिए कहा। मैंने एक असहाय सी नजरो से रुक्मिणी बुआ की तरफ देखा तो उनकी आखे सजल हो चुकी थे और कभी भी अश्रुधारा बह सकती है। वे नजरे झुकाये सड़क के किनारे खड़ी थी। चाचाजी ने न जाने उन्हें कितना बुरा-भला कहा, लेकिन वह सब चुपचाप सब सुनती-सहती गयी। और अंत में चाचाजी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर चल दिए, लेकिन रुक्मिणी बुआ तो अब भी वही खम्भे के सामान अविचलित सी खड़ी है। मेरी आँखे निरंतर उनको ही देखती रही, और खुद से काफी जद्दोजहद के बाद उनकी आँखों से आंसू निढाल हो गए। और धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से ओझल हो चुकी थी। मै खुद उस समय समझ नहीं पाया की कसूरवार कौन है ? - मै, बुआ, चाचाजी या कोई कसूरवार है भी की नहीं ?

इस घटना को आज तकरीबन आठ साल बीत चुके है, और शायद वह भी इस घटना को भूल चुकी थी, लेकिन आज भी जब-जब रुक्मिणी बुआ मेरे सामने आती है, तो मेरी नजरो के सामने वो मंजर चलचित्र की भाँती चल पड़ती है। उन्हें मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और ना ही उन्होंने किसी से इस घटना का जिक्र किया शायद इसीलिए मेरा अपराध बोध बढ़ जाता है। उस घटना के बाद मै उनसे ठीक से आँखे मिलाकर बात भी नहीं कर पाता हूँ। जब आज मै यह सच्ची घटना से आप सब को रूबरू कराने जा रहा हूँ, खुद से यही सवाल कर रहा हूँ की कसूरवार कौन ?

गुरुवार, 22 जून 2017

मेरे मन की



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शुक्रिया