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गुरुवार, 2 जून 2011

आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला


आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
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सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
कल पुर्जों ने गैस विषैली थी छोड़ी
लाश सडती पड़ी कूड़े कचरों की ढेरी
रक्त जैसे हों गंगा पशु पक्षी न कोई
पेड़ हिलने लगे मस्त झोंके ने आँखें जो खोली
व्योम नीला दिखा शिशु ने रो के बुलाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
(फोटो गूगल /नेट से साभार )

घबराहट अगर दिल बदल दो अब हैं दुनिया निराली
पाप हर दिन में हो हर समय रात काली
द्रौपदी चीखती -खून बहता -हर तरफ है शिकारी
न्याय सस्ता ,खून बिकता, जेल जाते भिखारी
घर से भागा युवा संग विधवा के फेरे रचाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
धन हो इज्जत लूटे रखे अब जमीं ना सुरक्षित
खून सर चढ़ के बोले उलटी गोली चले यही माथे पे अंकित
घर जो अपना ही जलता दौड़ लाये क्या मुरख करे रोज संचित
प्यार गरिमा को भूले छू पाए क्या -खुद को -रह जाये ना वंचित
एक अपराधी भागा अस्त्र फेंके यहाँ आज माथा है टेका
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
भूल माने जो- पथ शाम फिर लौट आये -न जाए
डाल बाँहों का हार -प्यार देकर चलो साथ स्वागत जताए
चीखती हर दिशा मौन क्यों हम खड़े ? आह सुनकर तो धाएं
भूख से लड़खड़ा पथ भटक जा रहे बाँट टुकड़े चलो साहस बढ़ाएं
स्वच्छ परिवेश रख -फूल मन को समझ
ध्यान इतना कहीं ये न मुरझाये
देख सूरज न कल का कहीं लौट जाए —-
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.६.२०११

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

खारे सागर में डूबे हम- गोता लायें मोती ढूंढें











(photo with thanks from other source)



आओ आज चलें उस दुनिया
खारे सागर में डूबे हम
गोता लायें मोती ढूंढें
ताज में अपने -सिंहासन में
अपने जड़ के
इस उफान में
हहर- हहर कर उठी तरंगे
चली बदलने दुनिया को जो
स्वागत उनका
आओ हाथ मिला कर -कर लें
बड़ी पुनीत है आत्मा उसकी
आओ करें समर्पण हम अब
गोदी उसकी इस अथाह में
भुला के सब कुछ
चैन से फिर सो जाएँ
तभी कल्पना मूर्त हमारी
शांति -लहर -ये रहे झुलाती
थपकी देकर
ऊपर नीचे
तन्हाई की गहराई में
जहाँ स्याह अँधियारा पलता
चाँद दिखाती
उजियारा कुछ
धवल चांदनी
दिल में अपने भर लायें
सपनों के इक राज महल में
कोई दीप जला जाये
उजियारा कर कोई प्रेयसी
जूही चंपा बेला जैसी
खुश्बू  देती
अन्तरंग महका जाये
जल तरंग की-परियां जल की
व्यथा वेदना हर जाएँ
आओ खुद को करें सुवासित
अंतर अपना पुष्प सरीखा
धवल -चांदनी वेद ज्ञान से
आज आत्मा को हम अपनी
अमृत तुल्य  बना डालें
हो गंगा सी -जिसमे आकर
खारा सागर -तर जाये

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
..२०११ जल पी बी

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

खटमल देखो -बढे जा रहे- बड़े प्रभावी





खटमल देखो -बढे जा रहे
बड़े प्रभावी
महिमा न्यारी
मोटा इनका पेट
लगे सेठ हैं -या हैं नेता
कोई रोंक न टोंक

खून चूसते उन्हें पिलाते
रक्त बीज सा  बढ़ते  जाते
रात ही क्या -अब दिन में निकलें
फिरते मूंछे ताने !!

सौ-सौ उनके पीछे घूमें
पकड़ो तो हम जानें

चार दिशाओं में ये भागें
देखो इनकी चाल
अगर रसायन-बम भी डालें
मरते बस दो -चार

ना ट्रैफिक की परवा इनको
ना नस-बंदी मानें
चूस भरे जो बोतल हैं ये
दान दिए बढ़ जाएँ

हमने फिर कुछ सोची युक्ति
पानी खौला  कल डालेंगे
रात में सारे छू मंतर थे
कैसे बड़े गुप्तचर निकले

सोच सोच मै पागल होता
कौन बताया कैसे जानूं
कोई दुश्मन बीच हमारे
थाली मेरे खाता -सोता

कहें भ्रमर आओ सब मिल के
चारों दिशा खड़े हो जाओ
हाथ जोड़ लो -घेरा डालो
सौ सौ को तुम मसलो मारो !!

यही अंत है भले तुम्हे ये
बुरा लगे है मन छू जाये
हाथ तुम्हारा सने खून से
कितनी सारी बदबू आये

या फिर इनका
डी एन ए तुम चेंज करा दो
पिछली पीढ़ी को ही इनके
भाई मेरे बदल तू डालो

बचपन ही से प्यार इन्हें तुम
नफरत ना -
पृथ्वी अपनी -अपनी संस्कृति
सभी सिखा दो !!

कहें भ्रमर खटमल ना इनको
कुछ और  बना दो -
सुन्दर सी एक ज्योति धरा दो  
कर में इनके
ले मशाल ये भी बढ़ जाएँ 
कल को जीतें 
मन सब का ये- विश्व विजय
कर- घर तेरे फिर -फिर फिर आवें 
दुनिया देखे -खटमल - खटमल
कह के फिर ना लोग तेरी
आत्मा को सालें  !!!
 या फिर आत्मा को हे बंधू
कल का सपना इनका देखे
आज से ही मजबूत बना ले !!



सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१६.०४.2011

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए



मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए

आज प्रभा ने भिनसारे ही

मुस्काते अधरों से बोला



कितने प्यारे लोग धरा के

उषा काल सब जाग गए हैं

घूम रहे हैं हाथ मिलाये

दर्द व्यथा सब चले भुलाये

सूर्य-रश्मि सब साथ साथ हैं

कमल देख ये खिला हुआ है

चिड़ियाँ गाना गातीं

हवा बसंती पुरवाई सब

स्वागत में हैं आई

सूरज नम है तांबे जैसा

जल निर्मल झरना कल-कल है

नदी चमकती जाती

सागर बांह पसारे पसरा

लहरें उछल उछल के तट पर

चरण पखारे आतीं

हे मानव तू ज्ञानी -ध्यानी

प्रेम है तुझमे कूट भरा

शक्ति तेरी अपार - है अद्भुत

हाथ जोड़ जो खड़ा हुआ

खोजे जो कल्याण भरा हो

मधुर मधुर जो कडवा हो

कड़वाहट तो पहले से है

पानी में भी आग लगी है

तप्त ह्रदय है जलती आँखे

लाल -लाल जग जला हुआ है

खोजो बादल -बिजली खोजो

सावन घन सा बरसो आज

मन -मयूर फिर नाचे सब का

हरियाली हो धरा सुहानी

छाती फटी जो माँ धरती की

भर जाये हर घाव सभी

सूर्य चन्द्र टिमटिम तारे सब

स्वागत-मानव-तेरे आयें

निशा -चन्द्र-ला मधुर-मास सब

थकन तेरी सारी हर जाएँ

मानवता को हे मानव तू

अमर करे

अमृत पिला -जिलाये !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर

http://surenrashuklabhramar.blogspot.com

प्रतापगढ़ उ.प्रदेश

१०..२०११ लेखन पी.बी.