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सोमवार, 15 जून 2015

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा और सीमा समझौता(Modi Bangladesh Visit)

मित्रों पिछले दो लेखों में सीमा समझौते का इतिहास वर्तमान एवं भारत के पक्ष के बाद आगे बढ़ते हुए जान लें की बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता:

बांग्लादेश में जब से शेख हसीना सरकार आई है वो प्रोइण्डिया(भारत के पक्ष की) सरकार मानी जाती है. यदि आप याद कर सके तो आसाम में सक्रीय उल्फा नाम के संगठन का एक समय बहुत आतंक था और वो बांग्लादेश में ट्रेनिंग कैम्प और गतिविधिया चलाता था. शेख हसीना सरकार ने उल्फा के सभी ट्रेनिंग कैम्प ध्वस्त करके उसके चीफ अरविन्द राजखोवा समेत उल्फा के सभी टाप कमांडर्स को बांग्लादेश में पकड़ कर हिन्दुस्थान के हवाले कर दियाजिनकी गिरफ्तारियां भारत के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों से दिखाई गयी. इसके अलावा बांग्लादेश में भारतीय इन्क्लेव्स में बसने वालों मुसलमानों को बांग्लादेश सरकार कोई सुविधा नहीं देती थी क्युकी वो भारतीय सीमा में थे. इन दो मुद्दों समेत भारत के पक्ष में खड़े होने के कारण कट्टर इस्लामिक ताकते और विपक्ष की नेता बेगम खालिदा जिया ने पाकिस्तान के शह पर शेख हसीना को घेरना शुरू कर दिया था अतः इस समझौते को आधार बना कर शेख हसीना अगले चुनाव में ये कह सकेंगी की सभी भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हुए और उसमे बसने वालों को बांग्लादेश सरकार सभी सुविधाएं देगी.इस समझौते के लिए शेख हसीना मोदी की कोई भी शर्त मानने को तैयार थी. शेख हसीना के बेटे का मोदी के अगवानी में आना भविष्य के नए समीकरण का संकेत दे रहा है.
चूकी शेख हसीना इसके बदले में भारत के साथ किसी भी सीमा तक सहयोग हेतु तैयार थी अतः भारत ने कुछ और समझौते किये जो सामरिक दृष्टि से भारत को सुरक्षित करने के लिए अत्यंत आवश्यक थे. जिसमे चीन के "string of pearls" योजना के दो बंदरगाह भारत को देना था जिसका विस्तृत विवरण पिछले लेख में दिया गया है।
चीन किस हद तक बांग्लादेश में घुसा है इसका दूसरा उदाहरण इस प्रकार समझ सकते हैं की जब 2002 के लगभग भारत में शोपिंग माल कल्चर आ रहा था उस समय तक चीन ने बांग्लादेश के कई हिस्सों में अपने खर्च से बड़े बड़े शोपिंग माल्स का निर्माण करा के अपनी स्थिति मजबूत करते हुए भारत को एक तरह से बांग्लादेश से बाहर कर के,बांग्लादेश को भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना दिया था.. इन सबको ध्यान में रखते हुए मोदी ने लगभग २२ समझौते किये.. चीन का व्यापारिक आधिपत्य तोड़ने और भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत ने बांग्लादेश को बिलियन डालर की क्रेडिट लाइन दी है इसके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये क्षेत्र के सामान बिलियन डालर तक बांग्लादेश को क्रेडिट अर्थात उधार पर दिए जायेंगे शर्त ये है की वो सामान भारत में बने हो। “MAKE IN INDIA” मुहीम को इससे बढ़ावा मिलेगा और 50 हजार रोजगार के अवसर तुरंत उत्पन्न हो जायेंगे. इसके साथ ही साथ हम वही सामान देंगे जिसके निर्यात में हम सक्षम हैं. मोदी ने बांग्लादेश से इस बात पर भी सहमती ले ली है की बांग्लादेश भारतीय कंपनियों के लिए SEZ बनाने के लिए जमीन देगा और उस SEZ में सिर्फ भारतीय कम्पनियाँ ही अपनी यूनिट लगा सकती हैं. इस SEZ के माध्यम से चीन क बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम आगे और भारत बढेगा।।
एक अन्य समझौते के तहत भारत की जीवन बिमा कंपनी LIC(भारतीय जीवन बीमा निगम) को बांग्लादेश में व्यापार की अनुमति मिल गयी है अर्थात अब LIC अपना व्यापार पडोसी देश में भी कर सकेगी.
भारत के दृष्टि से एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात जिसपर समझौता हुआ है वह है कोलकत्ता ढाका अगरतला बस सेवा और ढाका शिलोंग गुवाहाटी बस सेवा: पूर्व में 1650 किलोमीटर की दुर्गम एवं पहाड़ी दूरी तय करके दो दिन में कोलकत्ता से अगरतला पहुचना होता था अब इस बस सेवा से दुरी लगभग 500 किलोमीटर कम हो जाएगी तथा रास्ते भी अपेक्षाकृत सुगम होंगे. और अब 14-16 घंटे में यात्री कोलकत्ता से अगरतल्ला पहुच सकेंगे.इसका सीधा असर व्यापार और दैनिक गतिविधियों पर पड़ेगा. भारतीय संसाधनों और समय की बचत होगी..
यदि समेकित रूप से भारत के पक्ष से इसका विश्लेषण किया जाए तो ये दौरा नरेंद्र मोदी के किसी भी अन्य दौरे से ज्यादा सफल है क्युकी बांग्लादेश में होने वाली हर गतिविधि भारत की आंतरिक स्थिति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस शानदार उपलब्धी हेतु बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं..




आशुतोष की कलम से

बांग्लादेश दौरे में नरेंद्र मोदी ने तोड़ी चीन की मोतियों की माला (string_of_pearls )


#string_of_pearls
 #बांग्लादेश #चिट्टागोंग #मोंगला
मित्रों आप से एक ऐसी सूचना साझा कर रहा हूँ जिसे हर भारतीय को जानना ही चाहिए। मोदी के बांग्लादेश से किये किसी भी समझौते के समझने से पहले चीन के बांग्लादेश और भारत के पडोसी राज्यों में भारत के घेरने की रणनीति के बारे में समझना अति आवश्यक है.
भारत को घेरते हुए चीन ने सभी पडोसी देशो में अपने बंदरगाह बना दिए थे और इन बंदरगाहो को भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा.. 

नक़्शे में दिखाए गए पडोसी देशो में बनाये गए string of pearls से चीन ने सागर में भारत को घेर लिया था।। इनमे प्रमुख बन्दरगाह निम्न हैं।
√ श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह
√ पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह
√ बांग्लादेश में चिट्टागोंग और मोंगला दो बंदरगाह
√ मालदीव में मारा बंदरगाह
√ म्यांमार में क्यौक्पयु बंदरगाह।
चाइना इन्हें string of Pearls “मोतियों की माला” कहता था. भारत की दृष्टि से चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अत्यंत संवेदनशील थे।इन दोनों को चीन ने बांग्लादेश में बनाया था और वहां से अपनी गतिविधिया चलाता रहता था. मोदी ने सीमा समझौते के साथ ये समझौता किया की चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अब भारत के उपयोग के लिए खोले जायेंगे और अब चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट भारत की गतिविधियों हेतु उपलब्ध हैं. मतलब चीन की string of pearls के दो मोती भारत ने तोड़ कर "श्रीलंका से बांग्लादेश तक" सागर में खुद को काफी हद तक सुरक्षित कर लिया।। इसमें सबसा बड़ा झटका चीन को लगा है जिन बंदरगाहों को बनाकर उनसे वो भारत को घेरना चाहता था अब उन बंदरगाहों से भारत अपनी गतिविधियाँ चलाएगा और करोडो डालर खर्च करने के बाद चीन अब हाथ मल रहा है उसके हाथ कुछ नहीं आया ।
जो लोग रेत में सर डाले शुतुरमुर्ग की तरह मोदी के बिदेश दौरों और बांगलादेश से सीमा समझौते की आलोचना में लगे थे,क्या कभी इस बिंदु पर ध्यान दिया?? शायद पूर्व में ध्यान दिया होता तो चीन से हारे नहीं होते..UPA 1 चीन समर्थक कमुनिष्ट बैसाखी पर था अतः उन्होंने कुछ नहीं किया UPA2 घोटालो में व्यस्त था तो उन्होनें कुछ नहीं किया।अब मोदी चीन के चक्रव्यूह को तोड़ रहे हैं तो इन सभी द्रोहियों को समस्या हो रही है। एक व्यक्ति भारत को विश्व में स्थापित कर रहा है। सीमाओं को सुरक्षित कर रहा हैकम से कम उसका समर्थन नहीं तो बेकार विरोध भी मत करें।
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आशुतोष की कलम से