रविवार, 18 जनवरी 2015

पीके

शहीद भगत सिंह ने कहा था ‘‘आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिए लोग आपको अहंकारी कहेंगे।’’ सच ही कहा है, प्रायः लोग अपनी ‘लकीर के फकीर’ मानसिकता की परिधि से बाहर आते घबराते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि बाहर आने के पश्चात् उन्हें अन्य कोई आसरा नज़र नहीं आता या कोई अन्य मान्यता नहीं मिलती। वे स्वयं को असहाय-असहज महसूस करते हैं। और कदाचित् होते भी हैं। कारण- अज्ञानता, निर्भरता एवं भय। अज्ञानता के कारण वे निर्भर है और निर्भरता के कारण भयभीत। वे प्रायः अगुवाई करने से घबराते हैं और अगर कोई पथप्रदर्शक मिल जाए तो बीच राह में उसके अदृश्य हो, धोखा देने, जो कि मानवीय प्रवृति है, उन्हंे भयभीत कर देती है। वे ग़लत भी नहीं हैं। अक्सर ऐसी राहें जटिल तो होती ही हैं और उन पर दृढ़ रहना उससे भी अधिक कठिन होता है। बहरहाल यहाँ बात है आमिर खान की फिल्म पीके के बहिष्कार की। यह विरोध वास्तव में किसी लतीफे से कम नहीं है। बिलकुल ऐसा, मानो एक दृृृष्टिबाधित कह रहा हो कि सूरज लाल नहीं काला है। वास्तव में उसके लिए सूरज काला ही है और यह कहना उसकी विवशता। परन्तु जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं वे तो विवश नहीं हैं! फिर ये कैसी मानसिकता है? वस्तुतः जिन मुद्दों का विरोध किया जा रहा है वे तो फिल्म का हिस्सा भी नहीं है। विरोध है कि फिल्म हिन्दु विरोधी है और हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान करती है। जबकि फिल्म में प्रत्येक धर्म के ‘‘ठेकेदारों’’ का विरोध किया गया है, न कि किसी धर्म विशेष का। यह फिल्म अंधविश्वास और धर्म का धंधा करने वाले दलालों को केन्द्रित करके बनाई गई है फिर वे चाहे किसी भी धर्म के हों। सच तो यह है कि हम सभी इन ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं। इन्हें अपनी दुकान के रहस्य खुलते प्रतीत हुए तो नचा दिया जन-समूह को विरोध करने के लिए। ये पारंगत हैं मानसिक पराधीनता का दुरुपयोग करने में। क्या ऐसा नहीं है? इस बात का दावा किया जा सकता है कि जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं उनमें से अधिकतर ने तो यह फिल्म देखी भी नहीं होगी। तो भला क्यों कर रहे हैं विरोध? क्योंकि यह फिल्म एक मुस्लिम व्यक्ति ने बनाई है! यह तो कोई मुख्य वजह नहीं हो सकती! बॉलीवुड में हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया जाता है, टॉलीवुड में तमिल एवं इसी प्रकार अन्य। कहीं भी मुस्लिमवुड का अस्तित्व नहीं है और न ही इस प्रकार धर्मविशेष का अस्तित्व होना चाहिए। तो भला इस फिल्म को धर्म विशेष के लिए कैसे बना सकते थे? किसी भी विषय का सामान्यीकरण करके ही प्रस्तुत किया जाना विषय के साथ न्याय करना है। एक ओर तो हम धर्म-निरपेक्षता की बात करते हैं। ‘‘हम सब भारतीय हैं’’, के नारे लगाते हैं। दूसरी ओर किसी भी अनावश्यक विषय को धर्म-जाति से जोड़ देते हैं। किसी भी निर्माण के पीछे छुपी धारणा के स्थान पर निर्माता के धर्म को अधिक महत्त्व कैसे दिया जा सकता है? निर्माता द्वारा परोसी गई अश्लीलता दर्शकों एवं फिल्म की माँग के नाम पर सरलता से स्वीकार कर ली जाती है परन्तु वास्तविक एवं उपयोगी तथ्यों का विरोध मात्र इस आधार पर किया जाता है कि वे किसी धर्म से जुड़े हैं। निश्चित रूप से यह भावी पीढ़ी को भ्रमित करने का घृणित प्रयास है तथा सामाजिक दृष्टि से घातक भी है। इस फिल्म का एक बहुत सुंदर दृृश्य हमारी संकुचित मानसिकता एवं कुतर्कों पर कटाक्ष करता है। पीके पर आरोप था कि वह ईश्वर को नहीं मानता। उससे पूछा गया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते? उसने कहा मानता हूँ। बिलकुल मानता हूँ। मगर उस ईश्वर को मानता हँू जिसने हम सबको बनाया न कि जिसे आपने बनाया। सही ही तो कहा पीके ने। मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च इत्यादि में हमने अपने-अपने स्वार्थानुसार ईश्वर बनाए और अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार उन्हें पूजते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग तो ईश्वर को इसलिए पूजते हैं क्योंकि उनके पूर्वज उनकी पूजा करते आ रहे हैं। यदि उनसे पूछा जाए कि उनके ईश्वर का इतिहास क्या है या उनके माता-पिता कौन थे तो वे इससे अनभिज्ञ है, पूर्णतः निरुत्तर हैं। आज की युवा पीढ़ी तो इतनी आधुनिक हो गई है कि उन्हें होली-दिवाली जैसे मुख्य त्योहारों को मनाने के कारणांे तक का ज्ञान नहीं है। हाँ! लेकिन वे मंदिर अवश्य जाते हैं क्योंकि उनके भगवान जो वहाँ हैं। हम सभी जानते हैं कि मंदिरों में बैठकर किस प्रकार की चर्चाएँ की जाती हैं और प्रत्येक व्यक्ति इस बात की आलोचना भी बहुत ऊँची आवाज़ में करता है परन्तु वे सभी अवसर पाते ही स्वयं भी यही सब करते हैं। सही कहा जाता है कि भाषण दूसरों को देने के लिए ही होते हैं। ख़ैर बात यह है कि क्या यह सच्ची श्रद्धा है? या मात्र दिखावा या आत्मसंतुष्टि? यहाँ पुन शहीद भगत सिंह की बात प्रासांगिक लगती है कि प्रचलन का विरोध सरलता से स्वीकार्य नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ अपनी निरंकुशता के कारण ही समाप्त होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। सती प्रथा हो या विधवा विवाह प्रत्येक प्रथा के प्रति होने वाले विरोध के भी विरोध में लोग मान्यताओें और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का राग अलापते आए हैं परन्तु अन्ततः उन्हें समाप्त होना ही पड़ा। आज समाज के बुद्धिजीवी इन विषयों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा का विषय बना रहे हैं। उनका आम आदमी को इन भ्रमजालों से मुक्त करने का प्रयास सरहानीय है। वास्तव में आम आदमी स्वयं भी कहीं न कहीं इन समस्त पाखंडों से उकता गया है। वह स्वयं भी इन निरर्थक बंधनों से मुक्त होना चाहता है परन्तु साहस नहीं कर पाता। 1947 में भारत स्वतंत्र भले ही हो गया हो परन्तु मानसिक स्वतंत्रता से अभी भी वह कोसों दूर है। इस पराधीनता के अधीन रहकर उन्नति संभव नहीं और यह भौतिक परतंत्रता से कहीं अधिक घातक भी है। एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्वपटल स्वयं को स्थापित करने के लिए भारत को एक स्वतंत्र चिंतक होना अति आवश्यक है।

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

माँ ...........तेरे जाने के बाद






जब मै जन्मा तो मेरे लबो सबसे पहले तेरा नाम आया,
बचपन से जवानी तक हर पल तेरे साथ बिताया.
लेकिन पता नहीं तू कहा चली गयी रुशवा होकर,
की आज तक तेरा कोई पौगाम ना आया.
मै तो सोया हुआ था बेफिक्र होकर,
और जब जागा तो न तेरी ममता, ना तुझे पाया.
मुझसे क्या ऐसी खता हो गयी,
जिसकी सजा दी तूने ऐसी की मै सह ना पाया.
तू छोड़ गयी मुझे यु अकेला,
मै तो तुझे आखरी बार देख भी ना पाया.
तू तो मुझे एक पल भी छोड़ती नहीं थी,
फिर तूने इतना लम्बा अरसा कैसे बिताया.
तू इक बार आ जा मुझसे मिलने,
देखना चाहता हूँ माँ तेरी एक बार काया.

रविवार, 13 जुलाई 2014

रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश- एक सही निर्णय??( FDI IN DEFENCE)

पिछले कुछ दिनों से एक बहस छिड़ी है की रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश(FDI) को जो अनुमती दी गयी है उससे देश का फायदा होगा या नुकसान.हालांकि रक्षा विशेषज्ञ इस पर एकमत दिख रहे हैं.आगे का लेख लिखने से पहले मैं आप स्पष्ट करना चाहता हूँ की स्वयं में मैं स्वदेशी का एक प्रबल समर्थक हूँ और दूसरा की ये लेख नरेंद्र मोदी सरकार की किसी नीति को सही ठहराने के उद्देश्य से नहीं लिख रहा हूँ,इस काम के लिए भारतीय जनता पार्टी के पास काफी प्रबुद्ध प्रवक्ता हैं. वापस मुद्दे पर आते हुए रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश के पक्ष या विपक्ष में तर्क करने से पहले हमे कुछ रक्षा सम्बन्धी जरूरतों और उसके आपूर्ति के प्रबंधन के बारे में समझना होगा. पिछले बीस-पच्चीस साल में रक्षा क्षेत्र में अगर बड़ी आपूर्ति के नाम पर रुसी नेवी द्वारा रिटायर किया हुआ एडमिरल गोर्शकोव नामक युद्धक पोत(जिसे बाद में स्वदेशी नाम आईएनएस विक्रमादित्य दिया गया ) और मुलायम सिंह के रक्षामंत्री रहते हुए सुखोई विमानों की खरीद है, जो पूरी तरह से बिदेशी खरीद थी.
आजादी के बाद ही किसी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में शोध और उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया इसी कारण 1962 की हार के बाद से अब तक चीन से हमने आँख मिलाने की हिम्मत नहीं की और अपना प्रमुख प्रतिद्वंदी पाकिस्तान जैसे पिद्दे से देश को मान लिया जो पहले से ही गृहयुद्ध के कारण तबाह है. इधर पच्चीस सालो में सामरिक रूप से चीन ने हमे चारो और से घेरते हुए मुलभूत ढांचे में अत्यंत तीव्र गति से विकास कर लिया है.जिस चौकी तक हमारे सैनिको को पहुचने में 3 दिन लगेगा चीन ने वहां तक रोड बना के 4 घंटे में सप्लाई का प्रबंध कर दिया है. जब चीन से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो भारत की स्थिति शायद कही नहीं ठहरती है . चाहे हमारे तोप हो मिसाइल हो, जहाज हो या नेवीवारशिप सबमे चीन हमसे काफी आगे है.और यही बात किसी भी रीढ़वाली राष्ट्रवादी सरकार को पीड़ा देगी की वो अपने पडोसी के सामने घुटने टेकते हुए घिसट रहा है क्यूकी संसाधन नहीं उपलब्ध नहीं  हैं. विश्व की सबसे बहादुर सेना हताश निराश है क्यूकी उसके पास लड़ने के लिए बंदूके नहीं हैं.यह बात पूर्व सेना प्रमुख के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र से स्पष्ट है. अब यदि वर्तमान सरकार स्वदेशी फैक्ट्रियां डाल कर विमान युद्धपोत और अन्य रक्षा उपकरण बनाने लगे तो कम से कम यह 25 साल की परियोजना होगी. इस समय अंतराल की वास्तविकता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की लगभग  बीस साल से स्वदेशी विमान “तेजस” का निर्माण जारी है और आज तक वह विमान वायुसेना के मानको को पूरा नहीं कर पाया है जिससे उसकी सेवाओं का उपयोग भारतीय वायुसेना कर सके. इसमें 6 साल आदरणीय वाजपेयी जी के कार्यकाल के भी है जिनकी सरकार विकास सम्बन्धी फैसले में अव्वल थी.उस पर भी ध्यान देने योग्य बात ये है की इस विमान का इंजन बिदेशी है जिस पर हिन्दुस्थान का ठप्पा लगाया जायेगा .तो आप कल्पना कीजिये बिना इंजन के सिर्फ नियंत्रण प्रणाली और ढांचा पिछले बीस साल से बन रहा है सफल नहीं हुआ अगर इस आधार पर चीन से आँख मिलाने की परिकल्पना करे तो शायद पूरा पूर्वोत्तर भारत चीन के हवाले करना पड़ेगा और हमारी आँख फिर भी नीचे रहेगी.
इससे इतर जो बड़ी समस्या है की काल्पनिक रूप से यदि इतना बड़ा तंत्र खड़ा कर लिया जाये तो उसके लिए पैसे कहाँ से आयेंगे.जाहिर है इस पर ये कहना की कालेधन को स्विट्जरलैंड से माँगा कर रक्षा का आधारभूत ढांचा तैयार होगा एक कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं हैं. काल्पनिक रूप से ये भी मान ले की वित्त का प्रबंध हो गया तो क्या हमारे पास उस उच्च स्तर की तकनीकी और प्रशिक्षित प्रतिभाएं हैं . एक रक्षा विशेषज्ञ से संवाद के दौरान उन्होंने एक बहुत मौलिक प्रश्न उठाया की यदि भारत ने तेजस जैसे विमान की एक फैक्ट्री विकसित भी ले तो सिर्फ 100 विमानों के लिए विमान निर्माण का ढांचा नहीं बनाया जा सकता उसके बाद उसे ग्राहक कहाँ से मिलेंगे क्यूकी बिना शोध के हमारी तकनीकी 30 साल पुरानी होगी और रूस और फ़्रांस जैसे बड़े उत्पादक उससे कम दाम में उच्च तकनीकी उपलब्ध करा देंगे.
नासा या अन्य देशों में हमारी प्रतिभाएं सफल है क्यूकी वहां का शोध का आधारभूत ढांचा अत्याधुनिक एवं विश्वस्तरीय है.वहां सिर्फ हमारी प्रतिभाओं को मूल्य संवर्धन (VALUE ADDITION) करना है,जबकि इसके उलट भारत में पूर्ववर्ती सरकार की उपेक्षा के कारण शोध(RESEARCH) का आधारभूत ढांचा न के बराबर है. हमारी समस्या यही है की हम खीच खांच के घरेलू उत्पादन के बजट का जुगाड़ कर लें तो शोध के नाम पर “ऊंट के मुह में जीरा”. जबकि शोध और उत्पादन दोनों दो स्तर हैं एक विश्वस्तरीय उत्पाद के लिए. और उसमे भी सबसे प्रमुख है भारत में शोध क्षेत्र में काम न होना.सर्वप्रथम सरकार प्रथम स्तर पर कार्य कर ले फिर दूसरे स्तर उत्पादन पर कुछ सोचा जा सकता है..तो क्या जब तक ये सब स्तर हम प्राप्त न हो हम कोई भी उत्पाद बिदेश से न मंगाए या बिदेश पर निर्भर न रहे और अपने सैनिको और जनता को कांग्रेस के शासन काल की तरह मरने के लिए छोड़ दें?मेरी समझ से कोई भी ये नहीं चाहेगा की संसाधन की कमी से हमारे वीर सैनिक और निर्दोष जनता मारी जाये तो फिलहाल एक ही विकल्प बचता है बिदेश से रक्षा उपकरणों की खरीद और यही हम न्यूनाधिक मात्रा में कर भी रहे हैं. शोध और निवेश के अलावा रक्षा मोर्चे पर बिदेशों से रक्षा उपकरण मंगाने एवं FDI को हरी झंडी देने के पीछे दो और प्रमुख कारण हैं जिसे ज्यादातर लोग नजअंदाज कर रहे हैं प्रथम है तकनीकी स्थानान्तरण(Techonology Transfer) तो दूसरा है उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जे (Spare Part) के व्यापार का खेल.
हम जितने भी देशों से रक्षा उपकरण आयात करते हैं उसमे से रूस को छोड़कर कोई भी देश तकनीकी  स्थानान्तरण(Techonology Transfer) नहीं करता है. मतलब हमने कोई उपकरण ख़रीदा तो एक तकनीकी दल उसके प्रचालन की रखरखाव ट्रेनिंग ले कर आएगा और कंपनी ने अपना पल्ला छुड़ा लिया. अब यदि वही कंपनी यहाँ फैक्ट्री बनाती है तो हमारी सरकार का उसपर पूर्ण नियंत्रण होगा क्यूकी उसका निवेश हिन्दुस्थान में लगा होगा तो हमारी रक्षा व्यवस्था के साथ सहयोग को अस्वीकार करना आसान नहीं होगा.दूसरी और ऐसा संभव नहीं है की फैक्ट्री की सम्पूर्ण जनशक्ति (मैनपॉवर) बिदेश से आये.यहाँ फैक्ट्री होगी तो उस तकनीकी में हजारो भारतीय भी दक्ष होंगे ज्ञातव्य हो ये तेल साबुन बनाने की तकनीकी नहीं होगी,ये तकनीकी रक्षा उपकरणों से सम्बंधित होगी. जो आगे हमारे व्यवस्था के स्वदेशीकरण में लाभदायक होगा. हमारी सरकार का इस बात पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा की यहाँ से सस्ती जनशक्ति और संसाधन लेकर माल यहाँ बना कर अन्य देशों में न बेचा जाये मतलब हिन्दुस्थान में लगी फैक्ट्री का अधिकांश उत्पादन यही के लिए होगा.शोध कार्य वो अन्य इकाईयों(subsideries)के माध्यम से कर के यहाँ उपयोग कर सकते है.
रक्षा उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जों का एक बहुत बड़ा बाजार सक्रीय है जो एक बार उपकरण खरीद लेने के बाद कलपुर्जों के नाम पर मनमाने ढंग से मोटी रकम हिन्दुस्थान से वसूल करता है.जैसे सुखोई विमान हमने रूस से लिया उसका नोज संयुक्त रूस के किसी अन्य भाग में बना इंजन कही और ढांचा कहीं और बाकी उपकरण कही और. आज भारतीय वायु सेना के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है की रूस के विघटन के बाद उसे अलग अलग देशों से स्पेयर पार्ट खरीदने पड़ते हैं.कुछ देशों ने फैक्ट्रियां बंद कर दी अब किसी भी कीमत पर वो कल पुर्जे नहीं मिल सकते और सुखोई विमान उड़न ताबूत बन चुके हैं.यदि ये स्पेयर पार्ट हिन्दुस्थान में उपलब्ध होते तो कई हजार करोड का फायदा एवं कई विमानों की आयु बढ़ सकती थी. यही हाल अन्य रक्षा उपकरणों में भी है.
एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु ये है की यदि सामान यहाँ बना तो बिदेशी मुद्रा भंडार बचेगा जो वर्तमान अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है और उतनी ही पूंजी में हमें ज्यादा उपकरण मुहैया होंगे जिनके उत्पादन प्रक्रिया पर भारत सरकार का पूरा नियंत्रण अपने विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से होगा.इसके अलवा कुछ संशय इस बात पर हैं की हमारा पूरा रक्षा तंत्र बिदेशियों के हाथ में चला जायेगा तो यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है विदेशी निवेश कभी भी कोर सेक्टर जिससे देश की सुरक्षा में समस्या आ सकती है उसमे नहीं होता है. अभी फिलहाल में तो ये पेरिफेरल सेक्टर में है. जैसे नाईट विजन उपकरण आदि. कोई भी उपकरण खरीदने के बाद भारतीय रक्षा तंत्र अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमे परिवर्तन करता है जिससे किसी अन्य देश को जो उसी उत्पादक कंपनी से वही उपकरण लेता है,उससे हमारे उपकरण के कोर आपरेशन की गोपनीयता कुछ स्तर तक बनायीं जा सके.



जहाँ तक राजीव भाई के विचारों के समर्थन करने वाले बंधुओं का सवाल है राजीव भाई ने स्वयं अपने व्याख्यानों में शून्य तकनीकी उत्पादों जैसे तेल मसाला साबुन आदि में बिदेशी निवेश का विरोध किया है . उन्होंने स्वयं अपने व्याख्यानों में कहा है की कोई भी बिदेशी कंपनी भारत में मिसाइल या कोई रक्षा उपकरण बनाने की फैक्ट्री क्यों नहीं लगाती?? यदि आज उनकी बात को आंशिक रूप से सत्य किया जा रहा है तो इसका निषेध क्यों?? स्वदेशीकरण धीमी गति से चलने वाली लम्बी प्रक्रिया है. जो पांच साल में नहीं हो सकती हाँ मगर वर्तमान सरकार को सामानांतर रूप से स्वदेशी तकनीकी पर शोध को पर्याप्त अवसर देना होगा तथा ऐसे व्यवस्था की नींव रखनी होगी जिससे आने वाले दशक में हिन्दुस्थान कम से कम अपनी रक्षा जरूरतों का कुछ भाग में स्वावलंबी हो सके..

आशुतोष की कलम से 
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मंगलवार, 17 जून 2014

अटूट रिश्ते ..... टूटते से ....!

मन भटकता है,

रह रह कर ,

कभी यहाँ कभी वहां,

पता नहीं कब ? कब ? कहाँ ? कहाँ ?

बचपन ...और अपने गाँव की नदी के  किनारे..,

घूमते थे जहाँ शाम सबेरे,

और दोस्तों के साथ खेलते थे,

प्यास लगने पर

नदी का पानी पीते थे,

कभी शेर बनकर,

कभी मछली बनकर,  

तो कभी चुल्लू  लगा कर,

नहाते थे दिन में कई कई बार,

छूने, पकड़ने और छिपने के

कितने ही खेल खेलते थे,

नदी के पानी में,

और लोटते थे,

नदी की गोद में फ़ैली बालू में, 

नंगे पाँव चलते थे,

छप छप करते थे,

उथले पानी में,

कितने पिरामिड खड़े किये

बालू में

और कितनी ही आकृतियाँ बनाई,

कितने ही चींटी चींटों को कागज की नाव पर

नदी की सैर कराई,

कितने ही जल युद्ध होते थे,

पानी के थपेड़ों से,

एक दूसरे से,

सरोबोर होते थे हम सभी,

तैरने की  प्रतियोगिताएं भी होती थी कभी कभी,

जीतते थे,

हारते थे,     

पर कभी नहीं थकते थे,

कितने ही खजाने ढूँढ़ते थे ,

हम सब मिलकर,

गोताखोर बनकर , 

डुबकी लगा लगा कर,

सीपी, शंख,रंगीन सुंदर पत्थरों के टुकड़े,

और कुछ पुराने सिक्के मुड़े तुड़े,

आज भी मेरे पास अमानत है,

जो नदी से मेरे बचपन के रिश्ते की विरासत है,

ये हर चीज करती है खुद बयानी,

उस नदी की अनोखी, अनकही कहानी,  

जब बाढ़ आती थी,

लगता था जैसे

हम समुद्र के किनारे बस जाते थे

पानी की हिंसक लहरे,

और आर्तनाद करती भवरें,

दिल में अनगिनत उतार चढाव और कौतूहल भर जाते थे,  

हर रोज हम बाढ़ नापते थे,

और सरकंडे गाड़ कर बाढ़ रोकते थे,

हम इसमें सफल होते थे,

ऐसा मान कर बहुत खुश होते थे,   

पुल नहीं था,

पर गाँव में  किसी को इसका गम नहीं था,

निकसन काका की नाव शायद इसीलिये बनी थी,

जो जरूरतों  की अकेली रोशनी थी,

पैदल हो या साईकिल,

बकरी हो या भेड़

सबको इसकी जरूरत थी,

एक अटूट रिश्ते  से,

हम सब जुड़े थे,

अपने गाँव की इस सुंदर नदी से,

कई दशक बाद आज मै लौटा हूँ

उसी नदी के किनारे,

और ढूड रहा हूँ,

अपने अतीत के रिश्ते की वह कड़ी,

जिसकी नीव थी कभी यहीं पड़ी,

कभी सोचा भी न था कि

समय की सुई इतनी घूम जायेगी,

कि इस रिश्ते की जान पर बन आयेगी,     

मेरे बचपन की ये दोस्त और मेरी ये रिश्तेदार,

कृषकाय हो रही है, 

मलिन हो बीमार हो रही है,  

और सूख रही है

जगह जगह से,

शायद आख़िरी कड़ी भी टूट रही है

इस रिश्ते की

इससे....

हम सबसे .....!

********  

--शिव प्रकाश मिश्रा

  हम हिन्दुस्तानी

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मैंने भी प्यार किया था

http://hindikavitamanch.blogspot.in/
http://rishabhpoem.blogspot.in/
जी हां हमको भी प्यार हुआ था,
उम्र 15  साल।
कद छोटा, रंग काला और थोड़ा मोटा,
जब पड़ा था इश्क का अकाल।।
जब फिल्मो के हीरो अमिताभ,
और विलेन था सकाल।
और जब मै नाई से,
कटवा रहा था अपने बाल।।
जब मै बाल कटवा रहा था,
तभी वहा बवाल।
नाई थोड़ा घबराया,
बाल की जगह कट गया मेरा गाल।।
मै भी जिज्ञासा वस बाहर आया,
तो देखा नया बवाल।
दो प्रेमी मित्र मना रहे थे,
नया-नया साल।।
दोनों ने एक दुसरे को कसके पकड़ा था,
तब मुझे आया एक ख्याल।
लोगो ने किया था,
उनको देखकर लोगो ने किया था बवाल।।
लेकिन उस बवाल को देखकर,
मेरे मन में आया प्यार का ख्याल।
मैंने भी प्यार करने की ठानी,
लेकिन मेरे मन में आया एक सवाल।।
मैंने अपने स्कूल में ही,
कर दिया बवाल।
स्कुल में देखा एक नया माल।।
मैंने फ्लट किया,
बड़े सुन्दर है आपके बाल ।
लगते है हमेशा,
संसद में लटके हुए लोकपाल।।
मैंने आगे झूठ बोला,
आपके सुन्दर और फुले हुए गाल।
कराते है मेरे मन में हमेशा,
कश्मीर जैसा बवाल।।
मैंने किया प्रेम का इजहार,
तो उसने कर दिए मेरे गाल लाल।
फिर वहा खड़े लोगो ने पिटा,
फिर उसने पूछा एक सवाल।।
वैसे तुमने किया क्या था,
जो उसने किया बवाल।
जो इन बेरहम लोगो ने कर दिया,
तेरा यह बुरा हाल।।
मैंने उन्हें बताया,
करना चाहा प्यार कर दिया यह हाल।
अरे अभी तेरी उम्र ही क्या है,
खुद को पागल बनने से  संभाल।।