गुरुवार, 19 नवंबर 2015
दशरथ माँझी
प्रेम, सच्चा प्रेम, अथाह प्रेम, ‘दशरथ माँझी का प्रेम’। अगर कोई आम व्यक्ति उथले तौर पर देखे तो दशरथ माँझी को सनकी-ठरकी जैसे शब्दों से संबोधित करेगा। परन्तु यदि कोई वास्तव में प्रेम की गहराई को समझे तो वह प्रेम की एक ऐसी मिसाल हैं जो वर्तमान पीढ़ी को एक सुंदर एवं हृदयस्पर्शी संदेश देते हैं। उन्हें दिए गए ‘सनकी’ संबोधन को यदि सही शब्दावली दी जाए तो वे ‘जुनूनी’ थे। हवा के रूख के विपरीत स्वतंत्र आकाश में विचरण करने वाले ‘विजेता’। लगनशील, धैर्यशील एवं कभी हार न मानने वाले। समस्त विपरीत परिस्थितियों में, नकारात्मक संवादों के मध्य स्वयं को मात्र अपने प्रेम को समर्पित करने वाले ‘दशरथ माँझी’।
वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए प्रेम की जो परिभाषा है वह अत्यधिक संदिग्ध है। वास्तव में वे प्रेम, आकर्षण एवं हवस के मध्य भेद स्पष्ट करने में समर्थ नहीं हैं। उनके लिए प्रेम के मायने मात्र मौज-मस्ती एवं साथ जीवन बिताना है। और भी अनेक भद्दे क्रियाकलाप उनकी दिनचर्या के अंग हैं जिन्हें वे प्रेम का नाम देकर या तो अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं या वे वास्तव में अनभिज्ञ हैं। उन सभी को दशरथ माँझी के जीवन पर बनी यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए और समझना चाहिए कि सच्चा प्रेम किसी को उठा ले जाना, किसी की हत्या करना, किसी पर एसिड फेंकना या किसी के साथ दुराचार करना नहीं वरन् किसी के लिए समर्पित होना है। उसके दुःख-सुख को अपनाना है। उसकी भावनाओं को समझना है। उसकी आँखांे मंे आँसू अवश्य हो मगर खुशी के। परन्तु अत्यन्त खेद के साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान पीढ़ी ने प्रेम की अत्यधिक शर्मनाक परिभाषा गढ़ी है। ‘तू नहीं तो कोई और सही, कोई और नहीं तो कोई और सही’ या ‘तू मेरी नहीं तो किसी की भी नहीं’। दोनों ही स्थितियों मेें प्रेम का एक घृणित रूप प्रकट होता है। ‘लिव-इन’ जैसे संबंधों ने तो रिश्तों को ओच्छा रूप दे दिया। रिश्तों में बंधना एवं एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना हमारी युवा पीढ़ी को बंधंन प्रतीत होता है। स्वतंत्रता से स्वच्छंदता के सफ़र में वे आत्मीयता को खो चुके हैं। ‘लव-इश्क-मोहब्बत’ का राग अलापने वाले या तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में बंधना नहीं चाहते और यदि बंध गए तो उनका गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार पल-पल प्रेम व रिश्तों को अपमानित करता है। दुःखद यह है कि आगामी समय में इसका और विभत्स रूप ही देखने की उम्मीद है।
व्यक्तिगत् स्तर पर मैं यह महसूस करती हूँ कि ताजमहल की भाँति दशरथ माँझी द्वारा बनाए गए उस मार्ग को ‘राष्ट्रीय संपदा’ घोषित किया जाना चाहिए। हमारी लगभग समस्त ‘राट्रीय संपदाएँ’ भले ही हमारे सम्मानीय पूर्वजों प्रदत्त अनमोल उपहार हों परन्तु दशरथ माँझी की स्वनिर्मित यह रचना एवं कठोर तपस्या उनके सम्मुख अतुलनीय है। ताजमहल ‘प्रेम की निशानी’ अवश्य है परन्तु दशरथ माँझी के मार्ग एवं ताजमहल के मध्य तुलना की जाए तो ताजमहल ‘दीवानेपन’ का परिणाम है और ‘दशरथ माँझी मार्ग’ समर्पण का प्रमाण है। निश्चित रूप से अकेले विकट परिस्थितियों में पहाड़ तोड़ना, अपने दीवानेपन को अपने दासों की सुंदर कल्पना के माध्यम से प्रकट करने से कहीं ज़्यादा जटिल एवं महान है। दशरथ माँझी के उस प्रेम के तुल्य अभी तक कोई मिसाल मेरी जानकारी में नहीं है। वास्तव में इसकी तुलना करके इस पवित्र प्रेम को अपमानित भी नहीं किया जाना चाहिए।
जहाँ एक ओर ‘दशरथ माँझी मार्ग’ अपार प्रेम को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर यह दशरथ माँझी की जनहित भावनाओं को भी प्रदर्शित करता है। वे इस मार्ग का निर्माण इसलिए भी करना चाहते थे जिससे जो दुःखद घटना उनके जीवन का अंग बनी, उसकी पुनरावृत्ति किसी और जीवन में न हो। वे उस अपार कष्ट से इतने व्यत्थित थे इसकी कल्पना तक भी वे किसी अन्य के प्रति न कर सके। परहित के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। दूसरों के कष्टों को अपने जीवन का अंग बनाने वाले- ऐसे थे दशरथ माँझी।
केतन मेहता द्वारा निर्देशित यह फिल्म न केवल निर्देशन की दृष्टि से वरन् पात्रों के अभिनय की दृष्टि से भी अत्यधिक भावुक एवं बेहतरीन फिल्म है। निर्देशक ने छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से पिता का बच्चों के प्रति प्रेम, सरकारी तंत्रों की निकृष्टता, गरीबी, राजनेताओं का भद्दा प्रदर्शन, तानाशाही, जमींदारों की क्रूरता को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रदर्शित किया है। हम आभारी हैं केतन मेहता के जिन्होंने दशरथ माँझी जैसे महान व्यक्तित्व एवं उनके कठोर जीवन से हमारा परिचय कराया।
रविवार, 15 नवंबर 2015
देश के भविष्य
बच्चो,
तुम इस देश के भविष्य हो,
तुम दिखते हो कभी,
भूखे, नंगे ||
कभी पेट की क्षुधा से,
बिलखते-रोते.
एक हाथ से पैंट को पकड़े,
दूजा रोटी को फैलाये ||
कभी मिल जाता है निवाला
तो कभी पेट पकड़ जाते लेट,
होली हो या दिवाली,
हो तिरस्कृत मिलता खाना ||
जब बच्चे ऐसे है,
तो देश का भविष्य कैसा होगा,
फिर भीबच्चो,
तुम ही इस देश के भविष्य हो ||
नोट :- सभी चित्र गूगल से लिए गए है |
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Rishabh Shukla
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
आप सभी को विजय दशमी की हार्दिक शुभ कामनाएं
माँ दुर्गा के मंत्र
१. नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः .
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणिता:स्मताम ..
२. या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मीरुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ..
३. या देवी सर्व भूतेषु बुद्धिरुपेण संस्थिता .
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
४. या देवी सर्व भूतेषु मातृरुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
५. जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी.
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नामेस्तु ते..
६. देहि सौभाग्यमारोग्यम देहि में परम सुख़म .
रुपम देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ..
७. सर्व मंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके .
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणि नमोस्तु ते ..
८. सर्व बाधा विनुर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वित:
मनुष्यों मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: ..
९. शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे .
सर्वस्यर्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ..
१०. सर्वबाधाप्रश्मनं त्रिलोक्यस्याखिले श्वरि .
एवमेव त्वया यर्मस्मद्वैरि विनाशनम ..
*******शिव प्रकाश मिश्रा ***********
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
हिंदुस्तान का मुंह काला कर रहे है तथाकथित बुद्धिजीवी !
तस्लीमा नसरीन ने अभी हाल में दिए अपने
इंटरव्यू कहा कि हिंदुस्तान में यह एक
फैशन हो गया है जो लोग धर्म निरपेक्ष होते है (या कहलाते हैं ) वह हिंदुओं के
विरुद्ध होते है. उनका इंटरव्यू साहित्यकारों
द्वारा वापस किए जा रहे साहित्य अकादमी पुरस्कारों के परिपेक्ष में था. उन्होंने कहा
जब पश्चिम बंगाल में उनकी किताब पर प्रतिबन्ध लगाया गया और राज्य से बाहर कर दिया गया तो उन्हें दिल्ली आकर रहना पड़ा था. कट्टर
पंथियों के दबाव में उन्हें हिंदुस्तान भी
छोड़ना पड़ा, उस समय कम से कम साहित्यकारों ने तो कोई आवाज नहीं उठाई.
अब तक लगभग 24 साहित्यकार अपने
पुरस्कार वापस कर चुके है . और तो और मोहान की पतली पगडंडी से चल कर हजरतगंज पहुँचने
वाले अपने प्रिय मुनव्वर राना भी उसी श्रेणी में गिर चुके है. और न जाने कितने लोग
गिरेंगे ? और कितना गिरेंगे ? इन्हे नहीं मालूम जो ये काम कर रहे है, उससे विदेशों
में भारत की छवि कितनी खराब हो रही है ? पुरुस्कार
वापसी का सिलसिला कुलवर्गी जैसे लेखक की ह्त्या से शुरू होकर अख़लाक़ की हत्या से
जुड़ गया. अब तो पाकिस्तान ने भी कहना शुरु कर दिया है कि हिंदुस्तान में मुसलमानो
के साथ बहुत अत्याचार किया जा रहा है. इसका जबाब तो हिन्दुस्तान का मुसलमान ही दे
सकता है और उन्हें पाक को कड़ा सन्देश देना चाहिए.
पकिस्तान और उनके समर्थको की जानकारी
के लिए ये बताना उचित होगा पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हैं जिनकी जनसंख्या
1947 में 17 प्रतिशत से कुछ अधिक थी, जो
1998 में घटकर एक दशमलव छह प्रतिशत रह गई है और आज की तारीख में यह लगभग एक
प्रतिशत से भी कम है. कम से कम पकिस्तान जैसे देश को अल्पसंख्यको की दशा पर बोलने का कोई हक
नहीं है. क्या किसी धर्मनिरपेक्ष साहित्यकार ने इस बारे कभी पुरुस्कार वापस करने
के बारे सोचा ? जब कश्मीर में भयानक नरसंघार हुआ था और कश्मीरी पंडितो को घाटी से
बाहर कर दिया गया, जब गोधरा कांड हुआ, जब मुंबई बम कांड हुआ, जब दंगों में हजारों
सिखों की हत्या हुयी, तब कोई भी साहित्यकार पुरस्कार वापस करने क्यों नहीं आया ?
केंद्र में नई सरकार बनने के बाद पिछले डेढ़ साल
में ऐसा क्या हो गया जिससे इन साहित्यकारों ने इतना हाय तौबा मचा रखा है. क्या साहित्य अकादमी के पास राज्य
सरकारों से भी अधिक अधिकार है कि सम्पूर्ण भारत में कानून व्यवस्था सम्भाल ले. कानून
व्यबस्था राज्य सरकार का विषय है. क्या राज्य सरकारों को सख्त कारवाही से कोई
रोकता है ?
एक टी वी शो
में सुब्रमंयम स्वामी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर एक एजेंसी काम कर रही है जो भारत
में इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर माहौल को खराब करने की कोशिश कर रही है. इसका
मकसद न सिर्फ केंद्र में मोदी सरकार को परेशान करना अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करना भी
है . श्री स्वामी ख्याति प्राप्त व्यक्ति है उनके कहने में अगर कुछ भी सच्चाई है
तो सरकार को चाहिए कि पूरी घटना की जाँच कराई जाए और अगर कोई इस तरह की कोई एजेंसी काम
कर रही है तो उसे बेनकाब किया जाए. ऐसा लगता है कि सुब्रमणयम स्वामी की बात में
काफी सच्चाई है. पंजाब में हो रहे उन्माद के पीछे किसी सुनियोजित अभियान का पता
चला है . अभी पश्चिम बंगाल मे हुए नन रेप
कांड, दिल्ली और मुंबई में चर्चों पर हुए
हमले द्वारा माहौल ख़राब करने के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया. लेकिन
बड़े ताज्जुब की बात यह है केंद्र सरकार ने भी इन घटनाओं पर आ बहुत ज्यादा संज्ञान
नहीं लिया और ना ही इन घटनाओं की तह तक जाने की कोशिश की गई ताकि उस अभियान की पोल
खोली जा सके और उसके पीछे छिपे व्यक्ति की पहचान की जा सके. अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार
को चाहिए भारत में इस तरह चलने वाले किसी
भी अभियान को रोका जाना चाहिए ताकि भारत के अच्छे कार्यो को दुनिया को बताया जा
सके और भारत में तीव्र गति से विकास हो
सके . हिदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति पहले हिन्दुस्तानी है चाहे वह किसी भी
धर्म का क्यों न हो और हर हिन्दुस्तानी का फर्ज है कि वह सांप्रदायिक सौहार्द और
भाई चारा बनाये रखे .
******** शिव प्रकाश मिश्रा*******************
हम हिन्दुस्तानी http://mishrasp.blogspot.com
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
साहित्य अकादमी पुरस्कार या राजनैतिक हथियार ..
नयनतारा सहगल जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु की भांजी है, ने कुछ समय पूर्व साहित्य अकादमी पुरस्कार यह कहते हुए वापस कर दिया था कि भारत में लिखने की आजादी नहीं बची है और धर्मनिरपेक्षता के प्रति असम्वेदनशीलता बढ़ती जा रही है. ऐसा उन्होंने हाल ही में उत्तर प्रदेश के दादरी गाँव में गोमांस के संदेह में एक मुसलमान की हत्या होने के विरुद्ध में किया. उन्होंने कहा के वर्तमान सरकार के शासन में लेखकों के प्रति आक्रामकता बढ़ती जा रही है और जिसके विरोध में उन्होंने अपना पुरस्कार वापस करने का फैसला किया . देखते ही देखते कई कवि और साहित्यकारों ने अपने अपने पुरस्कार वापस कर दिए है. इनमे से कन्नड़ लेखक अरविन्द बलगती का साहित्य अकादमी आम परिषद से इस्तीफा देना भी शामिल है. पंजाब के तीन तथाकथित सुप्रसिद्ध लेखकों ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है. गुरबचन भुल्लर,औलख, अजमेर सिंह, नयनतारा सहगल आत्मजीत सिंह, उदय प्रकाश और अशोक बाजपेई जैसे लेखकों ने भी पुरुस्कारों के वापस करने की घोषणा की है. इस बीच साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष मे है और किसी भी लेखक के कलाकार पर आक्रमण या हमले की निंदा करती है .
यहां पर यह बात करना समोचित है कि यह पुरस्कार क्यों वापस किए जा रहे है ? पुरस्कार प्राप्त करने वाले कौन लोग है ? पुरस्कार किसे दिया जाता है ?और क्यों दिया जाता है ?
साहित्य अकादमी एक स्वायत्तता संस्था है और यह भारत की विभिन्न भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन के लिए मौलिक कार्य (किताब) पर दिया जाता है. वस्तुतः यह पुरस्कार रचना पर दिया जाता है और रचनाकार को सम्मानित किया जाता है. इस पुरस्कार की वर्तमान राशि एक लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र है. जिन्होंने ने यह पुरस्कार वापस किया है, अभी तक पता नहीं चला है कि उंन्होंने पुरस्कार की धनराशि भी वापस की है या नहीं. अगर पुरस्कार की धनराशि वापस हुई है तो जिस समय यह पुरुस्कार दिया गया था तब से लेकर आज तक इस पर बैंक की ब्याज दर के हिसाब से पूरा व्याज भी अदा करना चाहिये . लेखकों को यह भी बताना चाहिए कि जिस समय उन्हें यह पुरस्कार दिया गया था, क्या पहले उन्होंने इस बात की सहमति सरकार को दी थी कि अगर इस देश में कभी धार्मिक उन्माद फैलेगा या लेखकों के प्रति अनादर होगा तो वे पुरस्कार वापस करेंगे. इस तरह के ज्ञानी और बुद्धिमान साहित्यकारों से अब इस तरह की अपेक्षा नहीं की जा सकती. देश में जब तक सब कुछ आदर्श ढंग से चलेगा तब तक वह अपना पुरस्कार लिए रहेंगे. किन्तु देश के सामने अगर कोई चुनौती आएगी तो वह अपना पुरस्कार वापस कर देंगे और केंद्र में जो भी सरकार होगी उसका विरोध करेंगे. ये कायरता है.
ऐसा लगता है कि इन पुरस्कार और वापस करने के पीछे एक तुच्छ राजनीति काम कर रही है और उस राजनीति के दुष्प्रभाव के कारण यह पुरस्कार वापस किए जा रहे है जो किसी भी साहित्यकार के लिए सर्वथा अनुचित है. कहा तो यह जाता है कि साहित्यकार देश और समाज के लिए दर्पण का काम करते है ताकि उसमें समाज और देश अपनी छवि देख कर अपने आप को व्यवस्थित करने की कोशिश करता रहे और साहित्यकार लेखक स्वतंत्र रूप से अपना काम करते हुए सभी कुरीतियों और आलोकतान्त्रिक गतविधियों के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे और लोकतंत्र की रक्षा करेंगे. लेकिन आजकल ऐसे साहित्यकार भी पाए जाते है जो स्वयं यह घोषणा करते है अगर अमुक व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाएगा तो वह देश छोड़ देंगे, अगर अमुक पार्टी की सरकार बन जाएगी तो देश छोड़ देंगे. पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लेखक देश में भगवा करण से बहुत परेशान है. कितनी विडंबना है कि इस समाज और देश का मार्गदर्शन करने वाले तथाकथित लेखक और साहित्यकार सिर्फ इस बात से परेशान है कि इस देश में कौन सा राजनैतिक दल शासन करें और कौन सत्ता से दूर रहें. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जितने भी लेखक है उनमे से ज्यादातर को पुरस्कार अपने राजनीतिक संबंधो के कारण दिए गए थे और शायद यही कारण है कि वह अपने राजनीतिक संबंधो को महत्व देते हुए यह पुरस्कार वापस कर रहे है. इससे थोड़े समय के लिए ऐसा लग सकता है कि केंद्र सरकार के विरुद्ध एक जनादेश बना है लेकिन इस बात का बहुत जल्दी पता लग जाएगा कि इसके पीछे कौन सा राजनैतिक दल है. क्या इसमें कहीं किसी व्यक्ति विशेष के प्रति और किसी राजनीतिक दल विशेष के प्रति उनका दुराग्रह है ? और इसके पीछे क्या कोई षड्यंत्र काम कर रहा है ? निश्चित रुप से इस बात की जांच की ही जानी चाहिए. ऐसी क्या बात हो गई है जिनकी वजह से इन ज्ञानियों को त्याग पत्र देना पड़ रहा है. क्या इस तरह के त्यागपत्र लेखकों को किसी तरह की सुरक्षा दे पाएंगे ? और क्या उनके यह त्याग पत्र, देश में यदि कोई खराब वातावरण बन रहा है या साहित्यिक संस्थाओं का भगवा कारण हो रहा है, तो उसे रोकने में मदद मिलेगी ? कई प्रश्न है और यह जनमानस पूछ रहा है कि अभी कुछ समय पहले केरल मे एक प्रोफेसर के हाथ काट दिए गए थे और उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने एक धर्म विशेष के खिलाफ लिखा हुआ था, तब ये महानुभाव कहाँ थे ?
बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन, जिन्हें कट्टरपंथियों के दबाव में अपना देश छोड़ना और जो कोलकाता को अपना दूसरा घर मानती थी, लेकिन उन्हें कलकत्ता भी छोड़ कर जाना पड़ा. उनके बीजा न बढ़ाने में तत्कालीन सरकार के ऊपर अत्यधिक दबाव बनाया गया और उन्हें कुछ समय के लिए भारत भी छोड़ना पडा. पता नहीं उस समय क्रांतिकारी विचारो वाले और लोकतंत्र के ये महान जननायक कहाँ थे ? और लेखकों के अधिकार के प्रति जागरुक ये साहित्यकार कहां थे ? जयपुर में हुए एक साहित्यिक सम्मेलन में सलमान रश्दी को प्रवेश नहीं दिया जाता है, सिर्फ इसलिए प्रवेश नहीं दिया गया कि उन्होंने इस्लाम के विरुद्ध काफी लिखा है. उनकी किताब शैतानिक वर्सेस पर भारत ने प्रतिबंध लगाया गया. भारत के किसी भी साहित्यकार ने इस बात का विरोध नहीं किया. किसी भी लेखक को किसी भी संस्थान के प्रति विरोध व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन इनका प्रथम दायित्व है कि वह समाज के लिए ऐसा लिखे जिससे समाज और देश में रचनात्मक बदलाव आए और हमारी आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें. जिससे लोकतंत्र मजबूत हो और देश की विचारधारा प्रगतिशील बने. बजाय इसके लेखक अपने निजी स्वार्थ में लगे हुए है. इस तरह के कृत्य से किसी भी सरकार का न तो मनोबल गिराया जा सकता है, ना ही किसी भी देश का वातावरण समृद्ध किया जा सकता है और ना ही है ही देश में कोई विचारधारा का प्रसार किया जा सकता है. अगर किसी व्यक्तिगत कारण से किसी किसी व्यक्ति का या किसी विशेष राजनीतिक दल का विरोध करना है तो अच्छा होगा कि ये साहित्यकार राजनीति में प्रवेश करें और अगर उनमे इतना आत्मविश्वास है कि वे इस देश की दुर्दशा को दूर कर सकते है. इस देश में फ़ैली तमाम बुराइयों को दूर कर सकते हैं और इस देश में बढ़ गई धार्मिक असहिष्णुता को खत्म कर सकते है. लेखको को और अधिक आजादी दिला सकते है तो निश्चित रुप से उन्हें राजनेति करने चाहिए और सत्ता के शिखर पर पहुंच कर देश के लिए कुछ करना चाहिए. अगर वे राजनीति में नहीं आते है तो देख ही समझेगा कि वह किसी ने किसी राजनीतिक दल के इशारे पर यह काम कर रहें हैं जो बेहद शर्मनाक है. जो पुरस्कार उन्हें उनकी रचना पर दिया गया है उसे वह राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल न करें.
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- शिव प्रकाश मिश्रा
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