मंगलवार, 11 मार्च 2014

केजरीवाल के साथ मीडिया की सट्टेबाजी एवं टीवी टुडे की राजनीति में बुरे फसे पुण्य प्रसून वाजपेयी

दो दिन पहले आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल का एक वीडियो सामने आया जिसमे वो एक खबरिया चैनेलआज तक के एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ खबर फिक्स करते हुए स्पष्ट सुने जा सकते हैं. सोशल मिडिया पर आज तक चैनेल के पुण्य प्रसून वाजपेयी की आम आदमी पार्टी के साथ साठगांठ की खबरे पहले से आती रही हैं मगर कोई पुख्त्ता प्रमाण न होने के कारण इसे सम्पादकीय विशेषाधिकार की श्रेणी में रखते हुए इलेक्ट्रानिक मिडिया ने कभी कवर नहीं किया.हालाँकि इससे पूर्व भी आम आदमी पार्टी का गुणगान करते करते IBN7 के पत्रकार आशुतोष गुप्ता केजरीवाल की पार्टी के नेता बन चुके हैं..
उस वीडियों में एक बात और भी जो दृष्टिगत है पुण्य प्रसून वाजपेयी और केजरीवाल उस साक्षात्कार में किस प्रकार भगत सिंह के नाम का उपयोग वोट लेने के लिए इस्तेमाल किया जाये,
इस पर बाकायदा विचार विमर्श कर रहे है.इस बात की कड़ी निंदा भगत सिंह के परिवारजनो ने भी की है.ज्ञातव्य है इसी केजरीवाल के अभिन्न मित्र और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में भगत सिंह को आतंकवादी साबित किया है.
अब यक्ष प्रश्न ये है की क्या केजरीवाल ने मिडिया के दलाल किस्म के पत्रकारों से गठबंधन करके उनके सत्ता का लालीपाप दिखाकर राजनीति करने की एक नयी परंपरा प्रारंभ की है 
?? क्यूकी पत्रकारिता जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं क्या इस स्तर तक गिर गयी है जो राजीनीति के रहमोकरम पर पले. एक नेता जो खुद को ईमानदारी और पारदर्शिता का ठेकेदार कहता हैएक स्वयं को सबसे तेज चैनेल के सबसे तेज पत्रकार को ये निर्देशित कर रहा है की उसे क्या टीवी पर दिखाना है क्या नहीं दिखाना है ?? क्या आप मिडिया में संपादक की कुर्सी राजनेताओं के लिए आरक्षित करने की राजनीति में,एक पत्रकार की हैसियत सिर्फ चन्द टुकडो पर पलने वाला या राजनेता की टोपी पहनने को उत्सुक एक दलाल की बन गयी है?

वर्तमान हालात देखेते हुए इतना कह सकते हैं की पत्रकारिता इसी दिशा में बढ़ रही है और BEA एवं अन्य पत्रकारों तथा संपादको के संगठन को इस बात का संज्ञान ले के कुछ आत्मालोचना करनी होगी वरना हमाम में सब नंगे जैसे माने जायेंगे..इस खबर के आने के बाद zee News ने काफी सक्रियता दिखाई है क्या ये पत्रकारिता के उच्च मानदंड है जो zee News ने इस खबर को निरंतर दिखने का निर्णय लिया हैयदि आप इस मुगालते में हैं तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है. अगर थोड़े दिन पीछे जाएँ तो जिंदल और zee News का कोयले घोटाले की खबर से सम्बंधित दलाली खाने का विवाद आप को याद ही होगा.जब नवीन जिंदल ने स्टिंग कर के ZEE के दो पत्रकारों को जेल भिजवा दिया. उस समय आज तक के वर्तमान एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी ZEE TV के प्राइम टाइम एंकर थे.उस समय इसे जिंदल और सरकार की इमरजेंसी कहने वाले पुण्य प्रसून ने कांग्रेस सांसद और इंडिया टुडे ग्रुप से अच्छी खासी पेशगी ले कर ZEE News छोड़ कर AAJ TAK ज्वाइन कर लिया. अब यदि जिंदल,कांग्रेस,पुण्य प्रसून और केजरीवाल के गठबंधन पर नजर डाले तो आम आदमी पार्टी या केजरीवाल ने कभी भी जिंदल के कोयला घोटाले पर कभी नहीं बोला कारण केजरीवाल की पार्टी को मिलने वाला मोटा चंदा.कांग्रेस और केजरीवाल दिल्ली में साथ साथ थे सरकार बनाने में.यहीं से ZEE ग्रुप की कांग्रेस,जिंदल,पुण्यप्रसून और आज तक से दुश्मनी शुरू होती है. अब मौका मिलते ही ZEE ने जिंदल के चहेते केजरीवाल और पुण्य प्रसून को लपेटे में ले लिया है..
एक शंका सब के मन में होगी की ये वीडियो आज तक आफिस से लीक हुआ कैसे 
?? हालाँकि आज तक के कई जूनियर स्तर के कर्मचारियों पर इसकी गाज गिर चुकी है मगर असली लड़ाई इंडिया टुडे ग्रुप में एक अन्य पत्रकार राहुल कँवल और पुण्य प्रसून के वर्चस्व को ले कर है.. याद कीजिये इंडिया टुडे कानक्लेव जिसमे पुण्य प्रसून के चहेते केजरीवाल को राहुल कँवल ने किस प्रकार सोमनाथ भारती के मुद्दे पर धो डाला था जबकि पुण्य प्रसून को आप कभी भी केजरीवाल चालीसा गाते सुन सकते हैं. आज तक आफिस में भी दो समूह बन गए हैं उनमे से राहुल कँवल समर्थक ग्रुप ने अवसरवादी पुण्य प्रसून को बाहर का रास्ता दिखने हेतु ये वीडियो जान बूझ कर लीक किया ..
 आज तक ने इसका खंडन किया है मगर ये आज तक की सफाई कम मज़बूरी ज्यादा लगती है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार zee ग्रुप सुधीर चौधरी के साथ खड़ा था ...
जैसे भी ये प्रकरण उठा हो मगर इससे स्पष्ट हो गया की स्वच्छ रानीति का ढोल पीटने वाले केजरीवाल और उनकी पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन के वे सभी हथकंडे सिख कर अपनाने शुरू कर दिए हैं जिसे इस्तेमाल करके कांग्रेस पिछले ६० सालो से सत्ता के शिखर पर काबिज रही....

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

नक्सलवाद और खून खराबे की राह पर अरविन्द केजरीवाल .

पिछले कुछ दिनों से केजरीवाल मिडिया के कैमरों के फोकस से दूर हो रहे थे. कांग्रेस के साथ गठबंधन करके घसीटी गयी दिल्ली सरकार केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनने की पागलपन भरी महत्त्वाकांक्षा के बोझ के नीचे दब के ठहर गयी. अगर ध्यान से देखें तो शुरू से ही केजरीवाल की पार्टी विरोध की राजनीति करती आई है. भारतीय राजनीति के स्वघोषित ईमानदार ने जब दिल्ली की सत्ता 49 दिन में छोड़ दी इस कारण  दिल्ली की जनता खुद को ठगा महसूस कर रही थी और केजरीवाल का जनाधार तेजी से निचे जा रहा था अतः एक बार पुनः केजरीवाल ने अपना पुराना दांव चलते हुए हिन्दुस्थान के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए गुजरात के विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए गुजरात भ्रमण के कार्यक्रम का एक और स्टंट चला .यहाँ एक बात ध्यान देखने योग्य है की अब केजरीवाल जैसा व्यक्ति जिसने  दिल्ली की सत्ता ढंग से दो माह भी नहीं चला पाया और मैदान छोड़ कर भाग  गया वो पिछले १२ वर्षों से सफल शासन देने वाले नरेंद्र मोदी के कार्यों का मूल्यांकन करने का अद्भुत स्टंट करने गुजरात को निकला है.. राजनितिक दृष्टिकोण से देखें तो कांग्रेस में उर्जा नहीं बची है जो गुजरात में मोदी का विरोध कर सके अतः कांग्रेस से अपने पुराने अस्त्र के रूप में केजरीवाल को परोक्ष समर्थन दे कर नरेंद्र भाई मोदी को रोकने का एक अंतिम प्रयास कर लेना चाहती है. इस कुख्यात गठबंधन में कुछ न्यूज़ चैनेल और पुन्य प्रसून वाजपेयी जैसे दलाल पत्रकार भी सम्मिलित हैं. 5 मार्च को जैसे ही आम चुनावो के तारीखों की घोषणा हुई केजरीवाल ने आदर्श चुनाव संहिता और हिन्दुस्थान के कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए लगभग २० गाडियों के काफिले के साथ गुजरात भ्रमण पर निकले रास्ते में चुनाव आयोग के नियमो के अनुसार पुलिस ने केजरीवाल के काफिले को रोक कर, जब २० से ज्यादा वाहनों के एक साथ चुनाव प्रचार करने पर प्रश्न किया तो केजरीवाल ने खुद को गिरफ्तार करने की मांग रक्खी. दरअसल केजरीवाल चाहते भी यही थे की गुजरात में उन्हें गिरफ्तार किया जाये जिससे वो तथाकथित ईमानदारी के एकमात्र पुरोधा और नायक बन कर उभरे और एक ही दिन में नरेंद्र मोदी के समकक्ष आ खड़े हो जाएँ और केजरीवाल और उनकी गैंग अपनी इस राजनीति में काफी हद तक तब सफल होती दिखी जब गुजरात के पाटन में  पुलिस ने उन्हें लगभग २० मिनट तक थाने में बैठाये रक्खा.इस खबर को केजरीवाल के मिडिया के मित्रों ने अनवरत चलाना शुरू कर के पुनः केजरीवाल को युगपुरुष साबित करना प्रारंभ कर दिया और यहाँ तक बाते की जाने लगी की क्या मोदी केजरीवाल से डर गए हैं?? सच कहें तो शाम को ५बजे से पहले तक केजरीवाल अपने मनसूबे में सफल होते नजर आये मगर जैसे ही चुनाव आयोग का कडा रुख केजरीवाल ने देखा, प्रसिद्धि पाने हेतु उन्होंने अपना माओवादी और नक्सली रूप दिखाने का निर्णय लेते हुए मिडिया और एस एम एस द्वारा अपने सभी कार्यकर्ताओं को बीजेपी आफिस पर हमले का आदेश जारी कर दिया, जिसे आम आदमी कार्यकर्त्ता शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नाम देते रहे. शाम लगभग 5.15 बजे आम आदमी के पत्रकार से नेता बने आशुतोष गुप्ता और पत्रकार से नेता बनी शाजिया इल्मी के नेतृत्व में सैकड़ो आम आदमी कार्यकर्ताओं ने पुनः चुनाव आचार संहिता का उलंघन करते हुए दिल्ली के बीजेपी कार्यालय में हमला बोल दिया और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पोस्टरों को फाड़ डाला एवं तोड़फोड़ शुरू कर दिया
.

लाठी डंडे से लैस हो कर केजरीवाल प्रायोजित हमला 
केजरीवाल के कार्यकर्त्ता लाठी डाँडो से लैस होकर तोड़फोड़ करते रहे और दिल्ली पुलिस मूकदर्शक बनी रही. जब स्थिति बिगड़ने लगी तो भाजपा के कार्यकर्ताओं ने आत्मरक्षार्थ प्रतिरोध प्रारंभ किया और लगभग ४५ मिनट बाद ये अराजकता का कार्यक्रम दिल्ली पुलिस द्वारा बंद कराया गया . ज्ञातव्य हो की इस प्रदर्शन हेतु केजरीवाल की पार्टी ने कोई अनुमति नहीं ली थी और पूर्णरूप से गैरकानूनी रूप से भाजपा कार्यालय पर एकत्र हुए उसके बाद उग्र एवं हिंसक प्रदर्शन किया .


अब सवाल ये है की गाँधी के आदर्शों की बात करने वाली आम आदमी पार्टी को माओवादियों और आतंकियों जैसे स्टंट करने की क्या जरुरत आन पड़ी .. इस पर एक गहन विचार की आवश्यकता है , सत्य ये है की जब व्यक्ति अपने बुरे दौर से गुजरता है तो वास्तविक रूप में आ जाता है कुछ ऐसा ही है केजरीवाल के लोगो के साथ.दरअसल माओवाद और अलगाववाद के आधार पर खडी और पाकिस्तान और बिदेशी चंदे के खाद पानी का असली रूप यही है.नक्सलवाद की तर्ज पर बात बात पर सड़क पर उतर कर छापामार तरीके से अराजकता और हिंसा फैला कर केजरीवाल की पार्टी ने शहरी माओवाद का जो ताना बाना बुनना शुरू किया है उसका परिणाम चुनाव की घोषणा होते ही पहले दिन देखने को मिल गया.
आम आदमी पार्टी के विधायक बीजेपी कार्यालय पर हमला करते हुए 


जिस प्रकार नरेंद्र मोदी का कद प्रतिदिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है देश के साथ साथ बिदेश में भी कई शक्तियां इससे विचलित हैं. चीन और अमरीका कभी नहीं चाहेंगे की भारत राजनितिक रूप से मजबूत हो और यहाँ  एक स्थिर और रीढ़ वाली सरकार बने जो आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत निर्णय ले सके . चूकी नरेंद्र मोदी ने अपना आर्थिक सामरिक और विदेशनीति का अजेंडा मजबूती से कई मंचों पर रक्खा है जो अब भारतविरोधियों के माथे पर चिंता की लकीरे खीच रहा है. ये बात इससे भी पुष्ट हो जाती है की इस चुनाव का केंद्र बिंदु और कांग्रेस की गोंद में बैठी सभी पार्टियों का  एकमात्र विरोध का अजेंडा  नरेंद्र मोदी ही हैं..
मीडिया द्वारा पोषित  और विश्व के बचे एकमात्र स्वघोषित ईमानदार पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल दिन रात मोदी पर हमले कर रहे हैं जिससे की कम से कम एक बार नरेंद्र मोदी उनके आरोपों पर मुह खोले और वो रातो रात मीडिया के सहायता से नरेंद्र मोदी के समकक्ष खड़े होकर उनकी शक्ति को कमजोर करके भारत में पुनः एक राजनितिक अस्थिरता के मार्ग में धकेल कर खोखला किया जाये. मगर नरेन्द्रमोदी ने अपने एक कुशल प्रशासक का गुण और सालो का राजनितिक अनुभव दिखाते हुए “हाथी चलता रहता है और कुत्ते भोंकते रहते हैं” की नीति का अनुसरण करते हुए अपने राष्ट्रधर्म की लक्ष्य साधना में लगे हुए हैं. कांग्रेस और अमरीका पोषित केजरीवाल खीझ में एक के बाद एक अराजक स्टंट करते हुए मिडिया की सुर्खियाँ और फोर्ड फाउन्डेशन तथा पाकिस्तान से चंदा इकठ्ठा करने में व्यस्त हैं..
वस्तुस्थिति यह है की आज केजरीवाल का नाम आर्थिक,सामजिक,राजनितिक अराजकता का पर्यायवाची बन गया है. केजरीवाल का प्रभाव जहाँ भी है उस जगह को देखकर सोमालिया के मोगाधिशु जैसा अनुभव होता है जहाँ सरकार के नाम पर हथियारों से लैस लडाके और यहाँ तहां हिंसा फैलाते वार हेड्स के केजरीवाल जैसे नेता हैं.. अब जनता को यह समझना होगा की जिस प्रकार दिल्ली की जनता ने केजरीवाल पर भरोसा करके धोखा खाया क्या भारत की केन्द्रीय सत्ता के चुनाव में ये गलती दोहराकर पुनः देश को नीतिगत और आर्थिक रूप से पंगु बनाना चाहती है..

आशुतोष की कलम से  

बुधवार, 5 मार्च 2014

हमारा जौनपुर हमारा गौरव हमारी पहचान |

सोमवार, 3 मार्च 2014

आखिर क्यों राजनीति में आ रहे हैं अफसर ?

नौकरशाहों का राजनीति में आना क्या जायज है ..ऐसे ना जाने कितने सवाल मेरे मन में आ रहे हैं..इसके लिए क्या वर्तमान राजनीतिक हालात जिम्मेदार हैं या फिर कोई और कारण...नौकरशाहों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से भी इनकार नहीं किया जा सकता..। अभी तक राजनीति में डॉक्टर और वकीलों का ही वचस्व रहा है। लेकिन एकाएक आईएएस और आईपीएस रैंक के अधिकारी भी शामिल हो रहे हैं..यहीं नहीं सेना के बड़े अफसर और देश की सियायत में खुफिया विभाग के अधिकारी भी उतरें तो लोग सोचने पर मजबूर होंगे ही... पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह और रॉ के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी बीजेपी का दामन थाम चुके है..। अब सुनने में आ रहा है कि देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी भी जल्द ही बीजेपी का भगवा रंग धारण कर सकती है.. वैसे भी किरण बेदी का बीजेपी प्रेम किसी से छिपा नहीं है। .. संजीव त्रिपाठी पहले विदेशों में जासूसी करने वाली खुफिया एंजेसी रॉ के प्रमुख के तौर पर देश के दुश्मनों की हरकत पर नजर रखते थे अब बीजेपी में आकर विपक्षी दलों के नेताओं पर नजर रखेंगे..। पहले सेना में रहकर वीके सिंह देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी देख रहे थे अब मोदी के सारथी बनकर बीजेपी के मिशन २०१४ के लक्ष्य को आसान बनाने की कोशिश करेंगे....ये लोग देश में चल रही कांग्रेस विरोधी लहर में अगर लोकसभा भी पहुंच जाएं तो कोई ताजुब नहीं...। पिछले कुछ महीनों पहले पूर्व केंद्रीय गृहसचिव आरके सिंह, पूर्व पेट्रोलियम सचिव आरएस पांडेय और मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह नौकरी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं..बीजेपी इन नौकरशाहों को चुनावी रण में उतारेगी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इन नौकरशाहों को लगता है कि देश में चल रही नरेंद्र मोदी की लहर में वे भी सांसद बन जाएंगे..। ये लोग बीजेपी में शामिल होने से पहले कोई शर्त भी ऱखी होगी...हो सकता है मंत्री बनने के लिए लॉबिंग भी करवाएं..क्योंकि नेता जब चुनाव जीत जाते हैं तो उनकी नजर सबसे पहले मंत्री पद ही जाकर रुकती है.. इन्ही नौकरशाहों को देखकर और भी अफसर राजनीतिक अखाड़े में कूद सकते हैं..पार्टी कोई भी हो सकती है.. जो अफसर राजनीति में आने की सोच रखता होगा उसे नेताओं का तोता तो बनना ही पड़ेगा..ऐसे में राजनीतिक सोच वाले अफसर ईमानदारी से काम करते होंगे इसमें शंका ही है.... अगर निष्पक्ष तरीके से काम करने वाला अफसर नेताओं और मंत्रियों की नहीं सुनेगा तो हरियाणा में अशोक खेमका और उत्तर प्रदेश में दुर्गा शक्ति नागपाल की तरह उसका हाल होगा..जो बहुत कम ही अफसर चाहेंगे..। सताया हुआ अफसर अगर राजनीतिक दल से जुड़ेगा तो जाहिर है बदला लेने की कोशिश करेगा..ऐसे में सरकारी गोपनीय दस्तावेजों की जानकारी भी लीक हो सकती है...अगर राजनीतिक महत्वाकांशा वाला अफसर नेताओं के इशारे पर काम करेगा तो जाहिर है सरकारी खजाने की बंदरबांट होगी और साथ ही लोगों की हितों की अनदेखी भी । इन दोनों हालातों में अफसरों का रवैया देशहित में नहीं है..अगर ऐसा है तो यह सचमुच देश के लिए अच्छी खबर नहीं है.. मैं ये बातें इसलिए कह रहा है कि बीजेपी में शामिल होने वाले अफसर ज्यादार कांग्रेस शासन काल के ही हैं..पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह के उम्र विवाद को कौन भूल सकता है..। संजीव त्रिपाठी दिसंबर २०१० से दिसंबर २०१२ तक देश की सबसे बड़ी खुफिया एंजेसी रॉ के प्रमुख रहे। मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह भी कांग्रेस शासन काल में ही पुलिस विभाग में बड़े पद पर रहे..ये बताने की जरुरत नहीं है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार है..हो सकता है सत्यपाल सिंह कांग्रेस नेताओं के सताए हुए हों क्योंकि उन्होंने पुलिस कमिश्नर जैसे बड़े पद से इस्तीफा देकर बीजेपी के पाले में गए..पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह और पूर्व पेट्रोलियम सचिव आरएस पांडेय बेशक नौकरी से रिटायर होकर बीजेपी में शामिल हुए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया सकता कि उन्हें भी कांग्रेस सरकार में उन्हें परेशान नहीं किया गया होगा । आरके सिंह ने तो बाकायदा बीजेपी ज्वाइन करने के बाद केंद्र सरकार पर हमला बोला..उन्होने केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार पर सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करने का आरोप भी लगाया था..आरके सिंह ने तो सुशील कुमार को केंद्रीय गृहमंत्री लायक नहीं होने तक कह दिया था.. बीजेपी से जुड़ने के बाद सिंह ने स्वीकार किया कि गृह सचिव का पदभार संभालने के कुछ ही महीनों बाद से ही सुशील कुमार शिंदे से उनके मतभेद शुरू हो गए थे। ऐसा माना जाता है कि सभी सरकारें अपने पसंदीदा अफसर को ही बड़े पद पर बैठाती हैं...जिससे उनसे मन मुताबिक काम लिया जा सके..वैसे भी नेताओं और अफसऱों की जुगलबंदी से भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है ये जग जाहिर है..संयोग से कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में ही कई बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं..अगर प्रदेशों की बात करें तो जहां भी सबसे अधिक भ्रष्टाचार हुए हैं वहां पर सत्ताधारी दल और बड़े-बड़े अफसरों की मिली भगत सामने आई है..ये बातें जांच एजेंसियों से साबित भी हो चुकी हैं..चाहे यूपी में बसपा सरकार के शासनकाल में घोटाले रहे हों या फिर महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार रही हो या फिर कर्नाटक में येदियुरप्पा के नेतृ्त्व वाली बीजेपी सरकार रही हो.। सभी विभागों में मंत्रियों और नेताओं के साथ अफसरों की भ्रष्टाचार में सबसे अहम भूमिका रही है..अगर उद्योगपतियों की बात की जाए तो नेताओं की मिली भगत से ही महंगाई में आग लगी है...जिसकी तरफ आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं.. अगर इन हालातों में कोई अफसर ईमानदारी बरतेगा तो उसे प्रताड़ित तो होना ही पड़ेगा..लेकिन राजनीति में आकर फिर उसी दलदल में शामिल हो या बात समझ में कम आती है ..मै किसी पार्टी या फिर अफसर से नेता बने इन लोगों पर कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं..और ना ही ऐसी कोई मेरी मंशा ही है... लेकिन देश की जनता को यह पता होना चाहिए आखिर एकाएक अफसर राजनीति में क्यों आ रहे हैं..यदि विपक्षी पार्टी में शामिल हों तो शक और गहरा जाता है..आखिर राजनीति में आकर अफसर क्या संदेश देना चाहते हैं।