शनिवार, 22 जून 2013

संसार के सौ शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी नहीं .....

 
प्रतिष्ठित टाइम्स अखबार की  हायर एजुकेशन मैगज़ीन ने अभी हाल  ही में संसार के ऐसे सौ सर्वश्रेष्ठ  विश्वविद्यालयों की सूची बनाई जिनकी स्थापना ५० वर्ष के भीतर हुई है . दुर्भाग्य से भारत का कोई भी विश्वविद्यालय इस सूची में स्थान नहीं पा सका। ये बड़ी हैरानी की बात है परंतु इसका अर्थ ये नहीं है की सूची बनाने में  भारत के साथ कोई भेदभाव किया गया . इसमें २८ देशो के विश्वविद्यालय शामिल हैं किन्तु भारत के अलावा चीन और रूस का नाम भी गायब है .
 
 समूचे विश्व में हाल  के वर्षों में पढाई  के तौर तरीको और स्तर  में बहुत अंतर आया है  तुलनात्मक रूप से छोटे छोटे देशो ने अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल की है हमारा देश  बी टी सी और बी ऐड जैसे कोर्सों के साथ संघर्ष रत है  और प्राइमरी शिक्षा सुधारने  हेतु फैक्ट्री मॉडल पर शिक्षक उत्पन्न कर रहा है . प्राइमरी शिक्षा की दशा सुधरने की बजाय दिन प्रति दिन बिगडती जा रही है . स्वयं शिक्षको की माने तो उन्हें मुफ्त के तनख्वाह मिल रही है और घर के पास पोस्टिंग  . उनके पास अगर जन गणना  , चुनाव , मतदाता सूची निर्माण जैसे कार्य यदि न हों तो  वे निश्कोच कह सकते है की उनके पास कोई भी काम नहीं है . इस स्थिति ने प्राइमरी अध्यापक की नौकरी के लिए इतना अधिक आकर्षण पैदा कर दिया है कि  बी टेक , एम् टेक , एम् बी ए  आदि  बड़ी संख्या में  युवक इस अध्यापन की भीड़ में शामिल हो रहे हैं .
 
कोई भी विश्वविद्यालय या इंजीनियरिंग कॉलेज भारत में ऐसा नहीं है जहाँ के डिग्री धारको को कोई कंपनी नियुक्त करके सीधे या सामान्य  ट्रेनिंग करवा कर  काम पर लगा सके . उन्हें लम्बी ट्रेनिंग देनी होती है . यह प्रदर्शित करता है की उद्योग और विश्वविद्यालयों में कोई समन्वय नहीं है  मैकाले की शिक्षा  पद्धति को हम चाहे कितना भी दोष क्यों न दें  किन्तु  नए ज़माने की प्रोफेशनल कोर्सेज भी मैकाले की रह पर चल निकले हैं . शिक्षा के निजीकरण से ज्यादातर देशों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार  हुआ है . शायद भारत इसका अपवाद है जहाँ  निजीकरण से इस क्षेत्र को सिर्फ उद्योग धंधे की तरह चलाया जा  रहा है  बिना किसी क्वालिटी कण्ट्रोल के  इसमें निरंतर गिरावट होती जा रही है .
 
कालेजो और विश्वविद्यालयों से डिग्री लेने के बाद शायद ही कोई अत्यंत मेधावी छात्र  हो जो बिना कोचिंग के कोई भी  प्रतियोगिता  पास कर सके . चाहे  ये  प्रतियोगिता किसी नैकरी के लिए हो या फिर किसी दूसरे कोर्स में प्रवेश के लिए हो . इसी कारण कोचिंग व्यवसाय ने समान्तर बड़े उद्योग का रूप धारण कर लिया है . इससे निजात पाने का कोई साधारण तरीका ढूदना बहुत मुश्किल है .
 
कुछ विश्वविद्यालयो ने बी ए , बी कॉम  जैसी साधारण डिग्रियों के लिए ४ साल का समय कर दिया है . इसके पक्ष विपक्ष में बहुत तर्क दिए जा रहे हैं  परन्तु ये समय की बर्बादी के अतरिक्त और कुछ नहीं है . अभी बहुत वर्ष नहीं हुए जब इसका समय २ से बढ़ा कर ३ वर्ष किया गया था। इस २ साल की डिग्री करके बहुत से लोग वैज्ञानिक , प्रशासन  और प्रबंधन के उच्च पदों पर उत्कृष्टता से काम  कर रहे हैं .
 
खैर , भारत का कोई भी विश्वविद्यालय  इन सौ शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूची में क्यों नहीं आ पाया ? ये विचारणीय विषय है . संभवता निम्न  मुख्य कारण  है .
 
- विश्वविद्यालयो की कमजोर आर्थिक स्थित 
- पाठ्यक्रम में कमी 
- शिक्षण की गुणवत्ता में कमी 
- अनुशासन का अभाव  
-शिक्षको की क्षमता  और संख्या में कमी 
-मूलभूत सुविधाओं का अभाव 
-व्योहारिकता का अभाव  
-समय के साथ बदलाव का अभाव 
-उपयोगिता  और रोजगार पूरकता का अभाव 
 
 
टाइम्स मागज़ीन द्वारा प्रकाशित सूची  निम्नवत है .

THE 100 Under 50 universities 2012
 
1
Republic of Korea
71.8
2
Switzerland
66.2
3
Hong Kong
63.0
4
United States
60.0
5
Republic of Korea
58.6
6
France
56.3
7
United States
56.0
8
United Kingdom
55.7
9
United Kingdom
53.6
10
United Kingdom
51.0
11
United States
48.7
12
Hong Kong
48.5
13
United Kingdom
48.1
14
Germany
47.7
15
France
46.8
16
Singapore
46.0
17
Spain
45.7
18
Hong Kong
45.5
19
Netherlands
44.9
20
United Kingdom
44.7
21
United States
44.6
22
Germany
43.3
23
Sweden
42.1
24
Spain
41.7
25
Italy
41.1
26
Germany
40.7
27
Sweden
40.6
28
Canada
40.4
29
United States
40.3
30
Canada
40.0
30
Taiwan
40.0
32
Turkey
38.9
33
Australia
38.5
33
Australia
38.5
35
United Kingdom
38.4
36
Denmark
37.8
37
Italy
37.5
37
United Kingdom
37.5
39
Japan
37.1
40
Australia
37.0
41
Austria
36.8
42
Germany
36.5
43
Norway
36.2
44
Brazil
35.9
45
Australia
35.8
46
France
35.4
46
Hong Kong
35.4
48
Australia
35.3
49
Spain
34.9
50
Greece
34.5
50
United Kingdom
34.5
50
Canada
34.5
53
United States
34.4
54
Finland
34.3
55
Taiwan
33.5
56
United Kingdom
33.4
57
United States
33.0
58
New Zealand
32.4
59
Sweden
32.3
60
United Kingdom
32.2
61
United Kingdom
31.9
62
United Kingdom
31.1
63
United States
30.8
64
Republic of Ireland
30.1
65
Australia
29.9
66
Portugal
29.8
67
Denmark
29.7
68
Iran
29.2
69
United Kingdom
27.9
70
Taiwan
27.8
71
United Kingdom
27.7
72
United Kingdom
27.6
72
United Kingdom
27.6
74
Spain
27.1
75
France
26.6
75
Australia
26.6
77
New Zealand
26.4
78
Australia
26.1
78
Australia
26.1
80
United Kingdom
25.9
81
Australia
25.1
81
Australia
25.1
83
United Kingdom
24.9
84
United States
24.7
85
Portugal
24.6
86
Ireland
23.9
86
Spain
23.9
88
Australia
23.4
89
Taiwan
23.3
90
United Kingdom
22.9
91
Canada
22.6
92
United Kingdom
22.4
93
Australia
22.1
94
Saudi Arabia
21.8
95
Taiwan
21.7
96
Egypt
21.0
97
Ireland
20.3
98
Malaysia
20.0
99
Brazil
19.9
100
Australia
19.8
***************************************************************************
                                                                                           - शिव प्रकाश मिश्रा 
                                                                                          http://shivemishra.blogspot.com
 

मंगलवार, 7 मई 2013

चीन के हाथो एक और पराजय की गवाही देता दौलतबेग ओल्डी


दौलत बेग ओल्डी से चीनी सेना के बनकर हटाये जाने का कांग्रेस सरकार और कांग्रेस पोषित मिडिया

कुछ इस प्रकार ढिंढोरा  पिट रहे हैं जैसे उन्होंने ६२ में चीन द्वारा कब्ज़ा की हुई हजार वर्ग मिल की जमीं वापस पा ली हो .. ज्ञातव्य को की चीन का सीमा विवाद दशको पहले तिब्बत विद्रोह के बाद सन १९५९ में दलाई लामा को भारत में शरण देने के बाद से ही चला है जिसकी परिणिति कांग्रेस के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु  के शासन काल में १९६२ में हुए भारत चीन युद्ध के रूप में हुआ .. हिंदी चीनी भाई  भाई के नारे को देकर तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ इन लाई ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया और आधार बनाया मैकमोहन रेखा और हिमालय क्षेत्र की सीमा के निर्धारण को .. उस युद्ध में भारत की पराजय हुई और हमारा लद्दाख और अक्साई चीन की लगभग ७२ हजार वर्गमील जमीं चीन ने कब्ज़ा कर ली .. साथ ही साथ तिब्बत पर चीनी प्रभुत्त्व स्थापित हो गया . हमारे तात्कालिक प्रधानमत्री जवाहर लाल नेहरु उस समय कोट पर लाल गुलाब और सफ़ेद कबूतर उड़ने में व्यस्त थे और हमारा कैलाश जैसा धार्मिक क्षेत्र चीन के कब्जे में चला गया.. इस पराजय के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा को सीमा रेखा के रूप में मान कर विवादों का निपटारा द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से करने का समझौता हुआ जो की भारत के लिए एकतरफ़ा था.. आज त५अक चीन ने अरुणांचल प्रदेश से अपना दावा नहीं छोड़ा है . यहाँ चीन की दोगली नीति इसी बात से परिलक्षित होती है की जिस मैकमोहन रेखा को चीन ने कभी मान्यता नहीं दी उसी के अंतर्गत उसने पाकिस्तान के साथ अपना सीमा निर्धारण कर लिया. 



१९६२ की हार के बाद हिंदुस्थानी सेना ने अपने सामरिक तैयारियों में तेजी तो ले आया मगर कमुनिस्ट शासन में चीन की तैयारियां हिन्दुस्थान से दो कदम आगे ही रही. रक्षा उपकरणों की खरीद में दलाली एवं लालफीताशाही के कारन रक्षा सौदों में देरी ने चीन और भारत की सामरिक तैयारियों और चीन की सामरिक क्षमता में एक बहुत बड़ा अन्तर आ गया जिसे बढ़ने में भारतीय राजनेताओं की ढुलमुल इच्छाशक्ति ने बहुत बड़ा योगदान दिया. युद्ध के बाद सिर्फ इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया अन्यथा ज्यादातर प्रधानमंत्री चीन के सामने घुटने टेकने की नीति पर लगे रहे और इसमें सबसे शर्मनाक योगदान मनमोहन सिंह की वर्तमान कांग्रेस सरकार का रहा जिसने संसद में  ये बाद स्वीकारी की चीन ने सैकड़ो बार सीमा का उलंघन किया और भारत सरकार अपनी राजनितिक नपुंसकता का परिचय देते हुए इसे छोटी घटना माना.. सत्य ये है की कांग्रेसी सरकार भय खाने लगी है चीन से और रोज नए नए घोटालों से घरेलू मोर्चे पर दो चार होती कांग्रेस सरकार के पास बिदेशी नीति के स्तर पर आत्मसम्मान ख़तम हो चूका है . इसी कारण पाकिस्तान जैसा देश भी हमारे सैनिको के सर काट के भेजता है और हिन्दुस्थान की सरकार जबाब देने के स्थान पर सांकेतिक विरोध प्रदर्शन में व्यस्त रही है तो कभी हमारे विदेशमंत्री पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बिरयानी परोसने में व्यस्त रहते हैं .

अभी हाल की घटना में पुनः एक बार चीन ने हिंदुस्थानी सीमा क्षेत्र में लद्दाख के निकट दौलत बेग ओल्डी जो की लद्दाख में आता है में लगभग १९ किलोमीटर तक  अतिक्रमण कर लिया और अपने टेंट लगा लिए . हलाकि भारत सरकार इसे एक स्थानीय मुद्दा मान के आँखें चुरा रही थी मगर इसके पहले भी यदि हम देखें तो मनरेगा के तहत होने वाले काम को लद्दाख में चीन ने पहले भी रुकवाया है और भारत सरकार नपुन्सको की तरह झुकते हुए कार्य बंद कर दिया ..
हाल के दिनों में भारतीय सेना के चीन से सटी सीमा पर दौलत बेग ओल्डी
फुक्चे और न्योमामें ढांचागत सुविधाओं के निर्माण कार्य से चीन असहज हो रहा था और उसे रोकने के उद्देश्य से ये बार बार अतिक्रमण किया गया .
अबकी बार चीन ने पीछे हटने की शर्त रखते हुए गतिरोध तो सुलझाने के लिए चुमार जो की एक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पोस्ट थी वह से भारतीय सेना के बंकर हटाने और भविष्य में  पूर्वी लद्दाख में स्थायी निर्माण का काम बंद करने और कोई गतिविधि न करने की शर्त रख दी कांग्रेस सरकार ने चीन के सामने घुटने टेकते हुए और अपनी इज्जत बचने के उद्देश्य से चुमार से सेनाएं वापस बुला ली  वर्तमान स्थिति ये है की  चीनी सेना लद्दाख के देपसांग से तब गईजब इंडियन आर्मी चुमार से बंकर नष्ट करने के लिए राजी हुई। और पुनः चीन ने चालबाजी दिखाते हुए 19 किलोमीटर अतिक्रमण की हुई जमीन से सिर्फ २ किलोमीटर ही पीछे हटा है यानि अभी भी भारतीय भूभाग में चीन का अतिक्रमण है और भारतीय सेना पीछे हटती जा रही है हालत छोटे स्तर वैसे ही हैं जैसे १९६२ में थे अंतर इतना है की उस समय हमारे जवानों को प्रतिउत्तर देने की छुट थी आज उनके हाथ कांग्रेस सरकार की निकृष्ट बिदेश नीति  ने बांध रखें हैं.
एक दलाल किस्म के पत्रकार ने इसे कारगिल से बड़ी विजय के रूप में दिखाया मगर कारगिल में वाजपेयी जी के आदेश पर हमारे सीमा में घुस आये पाकिस्तानियों को हमने भगाया था न की अपने ही क्षेत्र में पीछे हटते हुए स्वयं के बनकर नष्ट किये थे .. आज स्थिति है की जिस जगह से भारतीय सेना चीन के दबाव एवं कांग्रेस सरकार के आदेश से पीछे हटी है वो अब भारतीय क्षेत्र से नो मैन्स लैंड(NO MANS LAND)  बन गया है और थोड़े दिन बाद चीन के कब्जे में ... 
चीन के लिए हिन्दुस्थान एक बड़ा बाजार है शायद हिन्दुस्थान की सरकार ने दृढ राजनितिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया होता तो हम सरे व्यापारिक सम्बन्ध चीन से ख़तम करके उस पर एक दबाव बना सकते थे इस कार्य में सहर्ष चीन का प्रतिद्वंदी अमरीका भी हमारे साथ होता . यथार्थ ये है की कांग्रेस शासन में चीन को उसकी भाषा में जबाब देने का सामर्थ्य किसी को नहीं है और हमारे सभी पडोसी धीरे धीरे हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं कभी बांग्लादेश में तो कभी पाकिस्तान तो कभी चीन यहाँ तक की नेपाल जैसा  देश भी अब भारत की सीमाओं में घुसने लगा है ..
शायद ये कांग्रेस की नपुंसक बिदेशनीति और रक्षानीति का पार्श्व प्रभाव है. दुखद ये है की मिडिया का एक तबका कांग्रेस की इस नाकामी और हिन्दुस्थान की एक और हार को अपनी विजय के रूप में प्रदर्शित कर रहा है और वास्तविकता के धरातल पर हमने कई किलोमीटर भूमि फिर खो दी भारत माँ का एक और अंग भंग कांग्रेस सरकार की नीतियों ने कर दिया.. 

माँ

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माँ शब्द ही एक सुन्दर एहसास है
ममता, उदारता, नम्रता
प्रेम और सम्मान का !

आशीर्वाद , निर्मलता
ईश्वर और उसके विश्वास का !!

बेटा सदा माँ का लाडला
सुन्दर और सुशील
और कोमल होता है !

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ऋषभ शुक्ला
9892331315
http://hindikavitamanch.blogspot.in/

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

(सफलता) The Secret / एक रहस्य





















क्या है सफलता? सफलता में इतना रस क्यों है? आदमी की इच्छाएँ अनंत हैं। इच्छाओं की पूर्ति में आदमी सफलता का अनुभव करता है। बचपन से लेकर बड़े होने तक हम सफलता चाहते हैं। एक बूढ़ा आदमी इसी में सफलता मानता है कि उसके बाल-बच्चे आत्म-निर्भर हो जाएँ ताकि वह शांति पूर्वक मर सके। यानी शांति पूर्वक मरना भी एक सफलता है। हमारी इच्छाएँ जब पूरी नहीं होतीं तो हम थोड़ी देर के लिए असफलता का दंश झेलते हैं। इस तरह आदमी का पूरा जीवन सफलता और असफलता के झूले में झूलता रहता है। जो चाहा उसे पा लिया तो हम सफल हैं तथा जो चाहा उसे नहीं पाया तो हम खुद को असफल मान लेते हैं। कोई चाहे कुछ भी कहे इच्छाओं की पूर्ति में आनंद हैं, सुख हैं, शांति है। इच्छा के रथ पर बैठ कर जब हम इच्छित तक यात्रा संपन्न कर लेते हैं तो हमें जीवन का सुख मिल जाता है। यही सफलता है। और इसी कारण से सफलता में रस है। किन्तु ऐसी सफलता हर बार और हर किसी को नहीं मिलती। कुछ दफा और कुछ लोगों को हीं यह सफलता नसीब होती है। क्या कोई मंत्र है जो हमें सफलता तक जरुर ले जाये? एक किताब दुनिया भर में काफी पढ़ी गयी है और मशहूर हुई है। उसका नाम है - रहस्य (the secret) उस किताब की जो मूल बात है उसे मैं आपके साथ शेयर करना चाहूँगा। जहाँ तक मैंने समझा है, इस पुस्तक के अनुसार जब आप किसी चीज़ की इच्छा करते हैं, तो उस इच्छा में एक आकर्षण होता है। उसी आकर्षण से आकर्षित हो कर इच्छित वस्तु भी आप तक आना चाहती है, और आ भी जाती है। यदि हम इस आकर्षण के सिद्धांत पर शत प्रतिशत भरोसा रखें और मन में किसी तरह की शंका न लायें तो यह आकर्षण का नियम काम कर जाता है और आप इच्छित वस्तु को पाकर सफलता का सुख अनुभव करते हैं। आकर्षण का यही नियम वह रहस्य है जो पुस्तक में लोगों को बताया गया है। पुस्तक का सीडी डीवीडी भी उपलब्ध है जिसे आप सुन देख सकते हैं। आप यदि चाहें तो सफलता के इस गुर को अपनी जिंदगी में अपनाकर परिणाम देख सकते हैं।   Please visit this site & gain natural health & complete health solution...  http://healthconsultant.in