शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012
अब न्याय नहीं प्रतिशोध चाहिए
हाथों में बैनर, तख़्ती और चार्ट पेपर लिए आक्रोश के साथ बढ़ता जा रहा विकराल कारवाँ। सबके दिलों में धधकती ज्वाला और लबों पर तिलमिलाते अल्फ़ाज़ और इन अल्फ़ाज़ों में निहित प्रश्नों की एक लंबी श्रृंख्ला। आज़ाद भारत के बाद शायद यह दृश्य पहली बार देखने को मिला। मानो सम्पूर्ण देश फिर किसी जंग के लिए एकजुट हो उठ खड़ा हुआ हो। मानो किसी ने देश के ज़मीर पर चोट की हो। मानो निरंकुश सन्नाटे में किसी की चीख हृदय को चीर गई हो। यह एक ऐसा मंजर है जिसे न किसी नेतृत्व की आवश्यकता है और न किसी आह्नान की फिर भी इनके उद्देश्य निश्चित हैं और मंजिल स्पष्ट।
यह जंग थी और है औरत के अधिकारों की, परन्तु इस बार इन अधिकारों की श्रेणी में आरक्षण अथवा संपत्ति का अधिकार सम्मिलित नहीं है वरन् यह माँग है सम्मान व सुरक्षा के अधिकार की। 16 दिसंबर को दिल्ली में घटित गैंगरेप की शर्मनाक घटना ने संपूर्ण देश की आत्मा को झकझोर दिया। दरिंदगी की समस्त सीमाओं के परे इस गैंगरेप ने महिलाओं की सुरक्षा एवं उनके सम्मान के प्रति सरकार, न्याय व्यवस्था एवं पुरूष समाज के विचारों पर कई प्रश्न चिह्न आरोपित कर दिये। राजधानी दिल्ली में अगर महिलाओं की सुरक्षा के दावे ठोकने वाली व्यवस्था पर अपराधी इस कदर तमाचा मार रहे तो अन्य राज्यों से क्या अपेक्षा की जाए! ए. सी. ऑफिस में विराजमान आलाकमान कितने गंभीर हैं सड़क की वास्तविकता के प्रति? क्या व्यवस्था परिवर्तन बलिदान के बिना अपेक्षित नहीं है? क्या इसके लिए किसी न किसी की बलि दी जानी इतनी आवश्यक है? और इस बलि के पश्चात् संवेदनशीलता के प्रमाण एवं न्याय प्राप्ति की क्या गारंटी है?
शायद कुछ भी नहीं। निष्ठुर व्यवस्था से किसी भी संवेदना अथवा दया की आशा करना मूर्खता है। यह शिकायत मात्र व्यवस्था से ही नही है। हमारा समाज भी अभी तक इसी संकीर्ण मानसिकता के अधीन जीवन यापन कर रहा है। जहाँ एक ओर भ्रूण हत्या, दहेज-हत्या, ऑनर किलिंग जैसे अपराध मानव जाति को शर्मसार कर रहे है वहीं दूसरी ओर बलात्कार जैसे निर्मम कुकृत्य पशु जाति को गौरवान्वित कर रहे हैं कि वे मानव नहीं है। इस घटना के प्रति उद्वेलित जनाक्रोश प्रथम दृष्टया सिद्ध करता है कि इंसानियत जीवित है। समाज संवेदनहीनता का समर्थक नही है और हम एक जीवित समाज में विचरण कर रहे है। परन्तु यह भ्रम टूटते अधिक समय नहीं लगा। जब सारा देश इस द्रवित कर देने वाली घटना से उबल रहा है उस समय भी कुछ या कहे बहुत से ऐसे निर्लज उदाहरण समाज में व्याप्त हैं जो इस प्रकार की शर्मनाक घटनाओं के लिए महिलाओं को ही दोषी ठहरा स्वयं को दोषियों के पक्षधर सिद्ध कर रहे हैं। फेसबुक पर एक ऐसे ही प्रोफाइल की सोच ने यह विचारने पर बाधित कर दिया कि इस देशव्यापी प्रदर्शन के मूल मेें कितनी ईमानदारी, सच्चाई, मानवीय मूल्य या संवेदनशीलता निहित हैं? कहीं यह सब भेड चाल तो नहीं? या मात्र एक दिखावा? या कहे कि ऐसे प्रदर्शनों में टीवी चैनलों व समाचार-पत्रों में अपनी तस्वीर देखने का माध्यम? फेसबुक के उस प्रोफाइल ने एक बात तो पूर्णतः स्पष्ट कर दी कि घटना भले ही कितनी भी जघन्य हो जाए परन्तु वह राक्षस प्रवृत्ति को परिवर्तित या शर्मसार नहीं कर सकती। जहाँ बलात्कार पीड़िता की दर्दनाक सच्चाई आँसू लाने के लिए पर्याप्त हैं, वहीं कुछ लोगों की सोच यह भी है कि अगर शेर (पुरूष) की गुफा में बकरियाँ (महिलाएँ) जाकर नाचेंगी तो यही होगा। कितना घिनौना एवं घटिया वक्तव्य है यह! प्रश्न यह है कि ऐसे कृत्यों को अंजाम देने वालों को क्या कहा जाए- शेर या कुत्ता? और क्या महिलाएँ बकरियाँ अर्थात् जानवर हैं? क्या यह विचारधारा शिक्षित समाज के अशिक्षित मस्तिष्क की नहीं है? इस वक्तव्य से एक बात तो सिद्ध हो जाती है कि पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं से सम्मान की अपेक्षा तो दूर की बात है इंसानियत की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। जब उनके लिए महिला का वजूद जानवर तुल्य है तो भला एक जानवर सम्मान का हकदार कैसे हो सकता है? वह तो दुत्कार के भाग्य का स्वामी है। परन्तु दयनीय स्थिति यह है कि जानवर को भी दिन में एक बार प्रेमपूर्वक पुचकार दिया जाता है और बलात्कार जैसे जघन्य कृत्यों से भी वह सुरक्षित है परन्तु दुर्भाग्यशाली महिला जाति इस स्तर पर भी हार जाती है। यह किसी एक व्यक्ति के विचार नहीं है। इस प्रकार के न जाने कितने विचार हमारे आसपास हमें मानव होने पर शर्मसार कर रहे हैं।
शर्मिंदा करने वाले शब्दों का अकाल सा पड़ जाता है जब दिल्ली में हुई इस दर्दनाक बलात्कार की घटना के दो दिन बाद के एक समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर एक राज्य के एक ही क्षेत्र में बलात्कार की नौ घटनाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि एक बेटी के लिए तो न्याय की गुहार अभी न्यायव्यवस्था को जगा भी न सकी थी कि कई और बेटियाँ अपनी सिसकियों में ही दम तोड़ गई। ज़रा सोचिए देशव्यापी आंदोलन की चीखें तो इस राक्षस प्रवृत्ति को व्यत्थित कर न सकी और जब देश शान्त भाव से अपने-अपने घरों में सपने बुन रहा होता है तब इन प्रवृत्ति की तिलमिलाहट किस सीमा तक क्रूर होती होगी? इसके प्रमाण दिल्ली की उस पीड़िता के देह पर प्रदर्शित हो रहे हैं? तो क्या यह आंदोलन क्षणभंगुर है या तत्कालिक परिस्थितियों का दिखावा? यह जनसैलाब शायद न्याय व्यवस्था के कुछ पृष्ठ तो परिवर्तित कर दे परन्तु समाज में व्याप्त उस सोच को कैसे परिवर्तित किया जाए जो इन अशोभनीय घटनाओं की जननी है?
क्या कोई अंत है इन सबका? कैसे लगेगा अंकुश इन सब पर? कैसे सुरक्षित अनुभव करें माँ-बेटी-बहन स्वयं को? क्या कभी ऐसा देश भारत देश हो सकेगा जब महिलाएँ अपने श्वास की ध्वनि से इसलिए न घबराए कि अगर किसी पुरूष ने उस ध्वनि को स्पर्श किया तो वह अपना वजूद खो देंगी? क्या कभी माता-पिता बेटी के जन्म पर निर्भय हो खुशियाँ मना सकेंगे? क्या कभी इस देश के महिलाएँ गर्व से कह सकेंगी कि हम उस देश की बेटियाँ हैं जहाँ हमें न केवल देवी के रूप में पूजा जाता है वरन् वास्तव में उस पूजा की सार्थकता प्रासंगिक है? क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऐसी घटनाओं से फिर कभी यह देश लज्जित नहीं होगा?
ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए किसी भी देश की कानून व्यवस्था का सख्त होना अति आवश्यक है। बलात्कार और ऐसी ही क्रूरता से लिप्त एसिड केस, ऐसी घटनाएँ हत्या से भी कहीं अधिक संगीन अपराध है। हत्या व्यक्ति को एक बार मारती है परन्तु ये घटनाएँ न केवल भुक्तभोगी को वरन् उससे सम्बन्धित प्रत्येक रिश्ते को हर पल मारती हैं और जीवन भर मारती हैं। प्रत्येक क्षण होती इस जीवित-मृत्यु की सजा मात्र सात वर्ष पर्याप्त नहीं है। देखा जाए तो मृत्युदंड भी इस अपराध के सम्मुख तुच्छ प्रतीत होता है। कई ऐसे देश हैं जहाँ इस प्रकार की घटनाओं की सजा स्वरूप अपराधी को नपुंसक बना दिया जाता है। शायद यह सजा उसे उसके अपराध का अहसास तो दिला सके परन्तु अगर भुक्तभोगी की सिसकियों से पूछा जाए तो वह कभी इस सजा को उस खौफ के लिए पर्याप्त नहीं मानेगी जो उसके मन में घर कर जाता है। उस अविश्वास को इस सजा से कभी नहीं पुनः प्राप्त कर सकेगी जो समाज के प्रति उसके मस्तिष्क में समा जाता है। उस दर्द की भरपाई यह सजा कभी नहीं कर पाएगी जो उसके कोमल अंगों को मिला है। और इस सजा की तसल्ली उसके आत्मविश्वास के लिए कभी पर्याप्त नहीं हो पाएगी। इस प्रकार के अपराध पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ तालिबानी तरीके ही कारगार साबित हो सकते हैं। ऐसे अपराधियों को ज़मीन में आधा दबाकर पत्थरों से मारा जाना चाहिए जिससे प्रत्येक पत्थर इस प्रकार की मंशा रखने वालों तक की रूह को कँपा सके। जिससे कोई भी दुष्ट विचार उत्पन्न होने से पहले ही अपने अंजाम को सोचने पर मजबूर हो सके।
सच पूछिए तो महिलाओं को संविधान में लिखित अधिकारों में संपत्ति के अधिकार देने से पूर्व सम्मान का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्हें सुरक्षा के अधिकार की आवश्यकता है। खुली हवा में स्वतंत्रतापूर्वक निर्भिक हो मुस्कराने के अधिकार की आवश्यकता है। अगर ये अधिकार उन्हें प्राप्त हो जाए तो असमानता स्वतः समाप्त हो जाएगी। लैंगिक असमानता का प्रश्न अस्तित्वहीन हो जाएगा। इसके लिए आवश्यकता है मानसिक स्तर की परिधि को विस्तृत करने की। संकीर्णता को समाप्त कर स्वतंत्र सोच के विकास की। अकेली महिला को देखकर जो आकर्षण पुरूष महसूस करते हैं उसके पल्लवित होने से पूर्व उस महिला के स्थान पर अपने घर की महिला को रखकर विचार करें। क्या आप अपने परिजनों के साथ किसी प्रकार का अशुभ होने की कल्पना करना चाहेंगे? यदि नहीं, तो त्याग दीजिए प्रत्येक उस विचार को जो दूसरों के घर की बेटियों के प्रति उमड़ता है। वैचारिक शुद्धता एवं पवित्रता ही इस समस्या का समाधान हो सकती है। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार और अच्छी संस्कृति का विकास करे। उन्हें प्रत्येक जाति (स्त्री व पुरूष) का सम्मान करने की शिक्षा दें। नैतिक मूल्यों का हृास किसी भी समाज के अंत का संकेत है और वर्तमान परिस्थितियाँ भारत के संदर्भ में वास्तव में चिन्तनीय हैं।
गुरुवार, 27 दिसंबर 2012
रक्तबीज
आदि-शक्ति देवी दुर्गा की पौराणिक कहानियों के एक दानव की कहानी बहुत प्रसिद्द है.उस दानव का नाम था रक्त बीज.
इस दानव को मारना असंभव सा हो गया था क्योंकि जैसे ही कोई उस दानव पे हथियार से वार करता, दानव के ख़ून की एक एक बूँद से नया दानव बन जाता था.
बिलकुल ऐसा ही एक रक्तबीज फिर से हमारे समाज में लाल रंग के साथ फैला जा रहा है.
राजनीति की भाषा में उस दानव को नक्सलवाद कहते हैं.
सरकार की अपनी राजनितिक मजबूरियों के कारण उस पे हथियार-प्रयोग के अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकती.
सेक्युलरवाद का प्रदर्शन करने वाली सरकार कभी भी वामपंथ (Left Wing) के प्रति कोई विनम्रता नहीं दिखा सकती. बार बार इन माओवादियों के खिलाफ सेना को लड़ने के लिए भेजा जाता है. सेना उनपे बंदूकें चलाती है और परिणाम क्या निकलता है- ये दानव और बढ़ जाता है. और सैनकों व पुलिस के जवानों को शहीद होना पड़ता है. सचमुच ये एक रक्तबीज है जितना काटोगे उतना बढेगा
आज 300 से ज्यादा जिले नक्सलवाद की हिंसा में जल रहे हैं. आखिर ये लाल रंग की हिंसा, गांधी के देश में आई कहाँ से? क्या होता है नक्सलवाद? क्या होता है माओवाद ? किसे कहते हैं वामपंथी?
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें इतिहास में बहुत पीछे जाना होगा.
17 वीं सदी में जब महान वैज्ञानिक जेम्स वाट ने भाप के इंजन का अविष्कार किया था तब दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव आया।
और यहीं से मशीनी युग की शुरुआत हुयी. मशीनी युग के आते ही समाज दो भागों में बंट गया- 1.पूंजीपति वर्ग (Capitalist Class ) और
2.मजदूर वर्ग ( Labor Class )
फैक्ट्रियों से होने वाले बड़े मुफाफे को फिर से नयी फैक्ट्रियों में लगा देने से पूंजीपति वर्ग और अमीर होता चला गया.
मशीनों से बने सामान बहुत सस्ते और अच्छी गुणवत्ता के होने के कारण, हाथ से बने सामानों की बिक्री ख़त्म हो गयी, मजदूर वर्ग और गरीब होता चला गया.
एक तरफ लोगों के हाथ से काम छीन गया और दूसरी तरफ पूंजीपतियों के पास प्रकृति के सभी संसाधनों पे कब्ज़ा करने की ताकत आ गयी.
पूंजीपति वर्ग का ताकतवर हो जाना गैर कानूनी नहीं था, लेकिन किसी एक व्यक्ति के द्वारा पैसों की ताकत से, सारे संसाधनों पे कब्जा कर लेना, जहां दुसरे लोग भूख से मर रहे हों, मानवता की दृष्टि में बिलकुल भी न्यायसंगत नहीं था.
समाज में पैदा हुयी इस दुविधा का हल किसी को नहीं दिखाई दे रहा था. समाज निराशा में डूब गया, वो इस बात से बेखबर था कि अचानक ही करिश्मे का जन्म होने वाला है.
उस करिश्मे का नाम था - कार्ल मार्क्स.
मार्क्स के अनुसार प्रकृति के सभी संसाधनों पे सारे मानवों का बराबर अधिकार है.
कैपिटलिज्म के विरोध में पैदा हुयी ये नयी विचारधारा कम्युनिज्म (कम्युनिस्ठवाद) के नाम से प्रसिद्द हुयी.
पीढ़ी दर पीढ़ी मार्क्स का कम्युनिज्म एक देश से दुसरे देश में फैलता चला गया.
मार्क्स के विचारों को राजनीती में महत्व मिलने लगा.
लेकिन यथार्थ के धरातल पे कैपिटलिज्म अभी भी नहीं हारा था. पैसों की ताकत के आगे विचारों की ताकत बहुत छोटी हो जाती है.
लोगों को लगने लगा था कि कम्युनिज्म सिर्फ कलम से स्थापित नहीं हो सकता.
और इसी के साथ जन्म हुआ कम्युनिज्म की भयानक स्वरुप का- माओत्से तुंग.
चीन में जन्मे विचारक माओत्से तुंग ने कम्युनिज्म को प्रबल करने के लिए हथियार उठाने की अपील की.
माओ के अनुसार कैपिटलिस्ट लोगों की हत्या कर देना ही एक मात्र हल है.
लोगों को माओ की ये बात बहुत ही सही लगी.
माओवाद इतनी तेजी से फैला जितनी तेजी से मार्क्सवाद भी नहीं फैला था.
चीन के निकटवर्ती भारत का उत्तर पूर्व का क्षेत्र भी माओवाद की आग से नहीं बच पाया.
उड़ीसा के एक गाँव नक्सलवाड़ी में आदिवासी माओवादियों ने कई उद्योगपतियों को जिन्दा जला दिया.
ये घटना नक्सलवाद के नाम से जानी गयी. यहीं से वो रक्तबीज भारत में फैलता चला गया.
मुझे यहाँ पे एक पुरानी घटना याद आ रही है. जब नक्सलियों ने एक कलेक्टर का अपहरण कर लिया था. जब वो कलेक्टर रिहा हो के आये तब स्वामी अग्निवेश ने उनसे पूछा- "आपको वहाँ किस तरह रखा जाता था ?"
कलेक्टर ने जवाब दिया- "जैसे मैं अपने घर पे रहता हूँ, मुझे वहां भी वैसे ही रखा जाता था, सभी लोग मुझसे दोस्तों की तरह बात करते थे, साथ बैठ के खाना खाते थे और किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होने देते थे"
स्वामी अग्निवेश ने कहा - "उन नक्सलवादियों को मेरा लाल सलाम"
एक नक्सलवादी भी आम आदमी होता है. उनका मकसद सिर्फ नरसंहार करना नहीं है.
पौराणिक दानव रक्तबीज की समस्या को देवी दुर्गा ने अच्छी तरह समझ लिया था और उसका सही समाधान निकाल लिया था.
उम्मीद है आने वाले समय में हमारी सरकार रक्तबीज पे हथियार उठा कर उसे और विकराल बनाने कि बजाये कोई समझदारी का कदम उठाएगी.
ये समस्या उतनी बड़ी नहीं जितनी हमने बना दी है, वो समय भी आएगा जब पूंजीवादी-अन्याय का हल, नक्सलवाद न हो कर कोई संवैधानिक और मानवीय तरीका होगा.
इस दानव को मारना असंभव सा हो गया था क्योंकि जैसे ही कोई उस दानव पे हथियार से वार करता, दानव के ख़ून की एक एक बूँद से नया दानव बन जाता था.
बिलकुल ऐसा ही एक रक्तबीज फिर से हमारे समाज में लाल रंग के साथ फैला जा रहा है.
राजनीति की भाषा में उस दानव को नक्सलवाद कहते हैं.
सरकार की अपनी राजनितिक मजबूरियों के कारण उस पे हथियार-प्रयोग के अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकती.
सेक्युलरवाद का प्रदर्शन करने वाली सरकार कभी भी वामपंथ (Left Wing) के प्रति कोई विनम्रता नहीं दिखा सकती. बार बार इन माओवादियों के खिलाफ सेना को लड़ने के लिए भेजा जाता है. सेना उनपे बंदूकें चलाती है और परिणाम क्या निकलता है- ये दानव और बढ़ जाता है. और सैनकों व पुलिस के जवानों को शहीद होना पड़ता है. सचमुच ये एक रक्तबीज है जितना काटोगे उतना बढेगा
आज 300 से ज्यादा जिले नक्सलवाद की हिंसा में जल रहे हैं. आखिर ये लाल रंग की हिंसा, गांधी के देश में आई कहाँ से? क्या होता है नक्सलवाद? क्या होता है माओवाद ? किसे कहते हैं वामपंथी?
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें इतिहास में बहुत पीछे जाना होगा.
17 वीं सदी में जब महान वैज्ञानिक जेम्स वाट ने भाप के इंजन का अविष्कार किया था तब दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव आया।
और यहीं से मशीनी युग की शुरुआत हुयी. मशीनी युग के आते ही समाज दो भागों में बंट गया- 1.पूंजीपति वर्ग (Capitalist Class ) और
2.मजदूर वर्ग ( Labor Class )
मशीनों से बने सामान बहुत सस्ते और अच्छी गुणवत्ता के होने के कारण, हाथ से बने सामानों की बिक्री ख़त्म हो गयी, मजदूर वर्ग और गरीब होता चला गया.
एक तरफ लोगों के हाथ से काम छीन गया और दूसरी तरफ पूंजीपतियों के पास प्रकृति के सभी संसाधनों पे कब्ज़ा करने की ताकत आ गयी.
पूंजीपति वर्ग का ताकतवर हो जाना गैर कानूनी नहीं था, लेकिन किसी एक व्यक्ति के द्वारा पैसों की ताकत से, सारे संसाधनों पे कब्जा कर लेना, जहां दुसरे लोग भूख से मर रहे हों, मानवता की दृष्टि में बिलकुल भी न्यायसंगत नहीं था.
समाज में पैदा हुयी इस दुविधा का हल किसी को नहीं दिखाई दे रहा था. समाज निराशा में डूब गया, वो इस बात से बेखबर था कि अचानक ही करिश्मे का जन्म होने वाला है.
उस करिश्मे का नाम था - कार्ल मार्क्स.
मार्क्स के अनुसार प्रकृति के सभी संसाधनों पे सारे मानवों का बराबर अधिकार है.
कैपिटलिज्म के विरोध में पैदा हुयी ये नयी विचारधारा कम्युनिज्म (कम्युनिस्ठवाद) के नाम से प्रसिद्द हुयी.
पीढ़ी दर पीढ़ी मार्क्स का कम्युनिज्म एक देश से दुसरे देश में फैलता चला गया.
मार्क्स के विचारों को राजनीती में महत्व मिलने लगा.
लेकिन यथार्थ के धरातल पे कैपिटलिज्म अभी भी नहीं हारा था. पैसों की ताकत के आगे विचारों की ताकत बहुत छोटी हो जाती है.
लोगों को लगने लगा था कि कम्युनिज्म सिर्फ कलम से स्थापित नहीं हो सकता.
और इसी के साथ जन्म हुआ कम्युनिज्म की भयानक स्वरुप का- माओत्से तुंग.
चीन में जन्मे विचारक माओत्से तुंग ने कम्युनिज्म को प्रबल करने के लिए हथियार उठाने की अपील की.
माओ के अनुसार कैपिटलिस्ट लोगों की हत्या कर देना ही एक मात्र हल है.
लोगों को माओ की ये बात बहुत ही सही लगी.
माओवाद इतनी तेजी से फैला जितनी तेजी से मार्क्सवाद भी नहीं फैला था.
चीन के निकटवर्ती भारत का उत्तर पूर्व का क्षेत्र भी माओवाद की आग से नहीं बच पाया.
उड़ीसा के एक गाँव नक्सलवाड़ी में आदिवासी माओवादियों ने कई उद्योगपतियों को जिन्दा जला दिया.
ये घटना नक्सलवाद के नाम से जानी गयी. यहीं से वो रक्तबीज भारत में फैलता चला गया.
मुझे यहाँ पे एक पुरानी घटना याद आ रही है. जब नक्सलियों ने एक कलेक्टर का अपहरण कर लिया था. जब वो कलेक्टर रिहा हो के आये तब स्वामी अग्निवेश ने उनसे पूछा- "आपको वहाँ किस तरह रखा जाता था ?"
कलेक्टर ने जवाब दिया- "जैसे मैं अपने घर पे रहता हूँ, मुझे वहां भी वैसे ही रखा जाता था, सभी लोग मुझसे दोस्तों की तरह बात करते थे, साथ बैठ के खाना खाते थे और किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होने देते थे"
स्वामी अग्निवेश ने कहा - "उन नक्सलवादियों को मेरा लाल सलाम"
एक नक्सलवादी भी आम आदमी होता है. उनका मकसद सिर्फ नरसंहार करना नहीं है.
पौराणिक दानव रक्तबीज की समस्या को देवी दुर्गा ने अच्छी तरह समझ लिया था और उसका सही समाधान निकाल लिया था.
उम्मीद है आने वाले समय में हमारी सरकार रक्तबीज पे हथियार उठा कर उसे और विकराल बनाने कि बजाये कोई समझदारी का कदम उठाएगी.
ये समस्या उतनी बड़ी नहीं जितनी हमने बना दी है, वो समय भी आएगा जब पूंजीवादी-अन्याय का हल, नक्सलवाद न हो कर कोई संवैधानिक और मानवीय तरीका होगा.
रविवार, 23 दिसंबर 2012
स्वामी श्रद्धानंद - २३ दिसंबर-- बलिदान दिवस
1856 में जालंधर में जन्मे स्वामी श्रद्धानंद को बचपन में ईश्वर पर
आस्था नहीं थी, लेकिन स्वामी दयानंद का प्रवचन सुनकर उनका जीवन बदल गया।धर्म के
सही स्वरूप को महर्षि दयानंद ने जनता में जो स्थापित किया था, स्वामी श्रद्धानंद ने उसे आगे बढ़ाने का निडरता के साथ कदम
बढ़ाया..... स्वामी श्रद्धानंद अपना आदर्श महर्षि दयानंद को मानते
थे....... महर्षि दयानंद ने राष्ट्र सेवा का मूलमंत्र लेकर आर्य समाज की स्थापना
की थी उन्होंने कहा था कि ' हमें और आपको उचित है कि
जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना,
अब भी पालन होता है, आगे होगा, उसकी उन्नति तन मन धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें ' । स्वामी श्रद्धानन्द ने इसी को अपने जीवन का मूल आधार
बनाया।. स्वामी जी ने हरिद्वार में
वैदिक भारतीय संस्कृति पर आधारित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की..... स्वामी
श्रद्धानंद जी ने गुरुकुल प्रारंभ करके
देश में पुनः वैदिक शिक्षा को प्रारंभ कर महर्षि दयानंद द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतो को प्रचार-प्रसार द्वारा कार्यरूप
में परिणित किया.....वेद और आर्ष ग्रंथो के आधार पर महर्षि दयानंद जी ने जिन
सिद्धांतो का प्रतिपादन किया था उन सिद्धांतो को कार्य रूप में लाने का श्रेय स्वामी श्रद्धानंद जी
को जाता है अछूतोद्धार,
शुद्धि, सत्य धर्म के आधार पर
साहित्य रचना, वेद पढने व पढ़ाने की ब्यवस्था करना, धर्म के पथ पर अडिग रहना, आर्य भाषा के प्रचार तथा उसे जीवकोपार्जन की भाषा बनाने का सफल प्रयास, आदि ऐसे कार्य है जिनके फलस्वरुप स्वामी श्रद्धानंद अनंत काल के लिए अमर हो गए। 4-अप्रैल , 1919 को मुसलमानों ने स्वामी जी को अपना नेता मानकर भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जामा मस्जिद पर आमंत्रित कर के स्वामी
जी का सम्मान किया था। दुनिया की यह पहली
घटना है जहां मुसलमानों ने किसी गैर मुसलिम को किसी मस्जिद से उपदेश देने के लिए कहा। स्वामी जी ने वहाँ अपना उपदेश त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शत् क्रतो बभूविथ वेद मंत्र से
शुरु किया और शांति पाठ के साथ अपने उपदेश को
खत्म किया। उन्होंने जामा मस्जिद से हिंदू और मुसलमानों को सद्भावना का संदेश वेद मंत्रों के साथ
दिया था।
उन्होंने पश्चिम उत्तर प्रदेश के ८९ गावो के मुसलमानों
को पुनः हिन्दू धर्म में शामिल कर समाज
में यह विश्वास जगाया कि जो किसी भी कारण से विधर्मी हो चुके है वो निसंकोच अपने
हिन्दू धर्म में वापस आ सकते है किन्तु राजस्थान के मलकाना क्षेत्र के एक लाख
मुस्लिम राजपूतों द्वारा अपने मूल हिंदू धर्म में वापसी उन्हें भारी पड़ी जिसके
परिणाम स्वरुप एक मदांध युवक अब्दुल रशीद ने 23 दिसंबर 1926 को दिल्ली के चांदनी चौक में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था ' स्वामी श्रद्धानन्द की याद आते ही 1919 का दृश्य आंखों के आगे आ जाता है। सिपाही फ़ायर करने की तैयारी में हैं। स्वामी जी छाती
खोल कर आगे आते हैं और कहते हैं- ' लो, चलाओ गोलियां ' । इस वीरता पर कौन मुग्ध नहीं होगा?
' महात्मा गांधी के अनुसार ' वह वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग शैय्या पर नहीं, परंतु रणांगण में मरना पसंद करते हैं। वह वीर के समान जीये तथा वीर
के समान मरे ' ।
आज
के समय मे जब बाबा रामदेव जी लुप्त प्राय:योग को जनप्रिय
बना सकते है तब आर्य समाज आगे क्यों नही बढ़
सकता?उसका विस्तार क्यो नही किया जा सकता ?समाज मे इतना पाखंड फैला हुआ है उसको आर्य समाज अपना दुश्मन
क्यो नही बनाता ?आपस मे ही
दुश्मनी क्यो ढ़ूंढी जा रही है ?यह दुश्मनी कब समाप्त होगी ?
यदि स्वामी जी जैसे कुछ लोग भी हमारे पास हों तो इस देश का काया पलट हो सकता है।
आज देश में जिस प्रकार आतंकवाद, अलगाव वाद, संस्कारहीनता
व सामाजिक कुरीतियों का बोलबाला है उनसे लडने के लिए ऐसे महापुरुषों की नितांत आवश्यकता
है। ऐसे महान पुरुष को शत शत नमन .........सोमवार, 17 दिसंबर 2012
महज़ एक छलावा तो नहीं है गरीबी का कम होना??
हमारी सरकार
गरीबी को कम करने के लिए हमेशा स्वयं को सजग दिखाती रही ,समय-समय पर तरह -तरह की योजनाओं का क्रियान्वयन करती रही ,गरीबी की गणना के लिए तरह-तरह की समितियों का गठन करती रही ,लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है की क्या सरकार वाकई में
प्रतिबद्ध है गरीबी को कम करने के लिए ?क्योंकि कई बार सरकार
द्वारा जारी आंकडें ही इनके क्रियाकलापों की पोल खोलते हैं.NSSO की रिपोर्ट के मुताबिक 1999-2000 में जहाँ देश में
निर्धनता का प्रतिशत 26.1 का तो 2004-05 में यह प्रतिशत घटकर 21.8 रह गया ,लेकिन 2008 में सरकार द्वारा गठित तेन्दुलकर समिति ,जिन्होंने 2009 में रिपोर्ट प्रस्तुत की ,रिपोर्ट के मुताबिक 2004-05 में निर्धनता का प्रतिशत
37.2 था . हाल ही में आमदनी और खर्च संबंधी राष्ट्रीय सैंपल
सर्वेक्षण संगठन [एनएसएसओ] के सर्वे में यह बात सामने आई है कि करीब 60 फीसद ग्रामीण आबादी रोजाना 35 रुपये से भी कम पर
गुजर-बसर करने को मजबूर है। इनमें से भी 10 फीसदी लोगों की
हालत तो और बदतर है। जीने के लिए वे सिर्फ 15 रुपये ही
रोजाना खर्च कर पाते हैं। सरकार तमाम योजनाओं के जरिए गरीबी दूर करने के दावे कर
रही है, लेकिन खुद उसी के आकड़े ही इन दावों की पोल खोल रहे
हैं।
एनएसएसओ की ओर
से जुलाई, 2009 से जून, 2010 के बीच कराए
गए सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में
एक व्यक्ति का औसत मासिक खर्च 1,054 रुपये है। वहीं शहरी इलाकों में यह
आकड़ा 1,984 रुपये मासिक है। इस हिसाब से शहरवासी औसतन 66 रुपये रोजाना खर्च
करने में सक्षम हैं। वैसे, 10 फीसद शहरी आबादी भी मात्र 20
रुपये पर गुजारा कर रही है। यह राशि ग्रामीण इलाकों से थोड़ी ही
ज्यादा है।
सर्वे की मानें
तो महीने के इस खर्च के मामले में बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों की हालत सबसे
ज्यादा खराब है। यहा लोग करीब 780 रुपये महीने पर
अपना भरण पोषण कर पाते हैं। यह रकम महज 26 रुपये रोजाना
बैठती है। इसके बाद ओडिशा और झारखंड का स्थान है, जहा प्रति
व्यक्ति 820 रुपये महीने का खर्च है। खर्च के मामले में केरल
अव्वल है। यहा के ग्रामीण 1,835 रुपये मासिक खर्च करते हैं।
शहरी आबादी के मासिक खर्च में महाराष्ट्र शीर्ष पर है। यहा प्रति व्यक्ति खर्च 2,437
रुपये है। बिहार इस मामले में भी सबसे पिछड़ा हुआ है। यहा की शहरी
आबादी मात्र 1,238 रुपये महीने पर पेट पालती है।
एनएसएसओ के
अनुमान पर ही योजना आयोग ने शहरी इलाकों में 28.65 रुपये
और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपये रोजाना कमाने वालों को
गरीबी रेखा से नीचे रखा था। इन आकड़ों पर खूब बवाल मचा था। आयोग के मुताबिक वर्ष 2009-10
में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों [बीपीएल] की संख्या 35.46
करोड़ थी। वर्ष 2004-05 में देश के 40.72
करोड़ लोग इस रेखा से नीचे रह रहे थे।
योजना आयोग की नई
शर्तों के मुताबिक शहरी इलाकों में रोजाना 28 रुपये
से अधिक कमाने वाले और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन 22 रुपये
से अधिक आय करने वाले लोग गरीब नहीं है!
इन सबको देखते
हुए मस्तिष्क में एक विचार का आना स्वाभाविक है की कांग्रेस सरकार ने गरीबी आंकलन
के खाद्यान स्तर को बदल के मौद्रिक स्तर क्यों कर दिया ?कहीं इसमें भी तो उसकी कोई साजिश नहीं , क्योंकि
खाद्यान की कीमत तो घटती -बढ़ती रहती है ,जबकि मौद्रिक स्तर अप्रभावित रहता है ,अर्थात सरकार
कुछ न कर पाई तो गरीबों की थाली पे ही दे मारा !गरीबी
आंकलन के लिए जिस ' Minimum Basket Of List' का निर्धारण सरकार ने स्वयं
किया था ,आज वो उसी पे कायम नहीं है !
हाल ही में
दिल्ली की मुख्यमंत्री माननीय शीला दीक्षित जी ने अन्नश्री योजना की शुरुआत करते
हुए कहा कि वो गरीब परिवारों(औसतन 5 व्यक्ति के ) को अनाज के बदले में हर महीने 600 रुपए देंगी। मतलब एक व्यक्ति को खाने के लिए 4 रुपए प्रतिदिन... कितना भद्दा
मज़ाक है शीला दीक्षित का क्यूकी 4 रुपए मे दो समय का खाना तो दूर एक कप चाय भी नहीं
मिलती॥ उन्होनें कहा कि 600 रुपए में एक परिवार के लिए महीने
भर का दाल, चावल और गेहूं तो मिल ही सकता है। लेकिन
प्रश्न ये है की क्या इतने दाम खाद्य पदार्थ मिल जायेगा और अगर मिला भी तो उसकी
गुणवत्ता क्या होगी ? लगता है मुख्यमंत्री
साहिबा ने दो दिन पहले आयी भारत के लोगों की औसत आयु की रिपोर्ट नहीं पढ़ी। उसमें
लिखा है कि भारत के पुरुष 54 और महिलाएं 56 वर्ष की आयु के बाद बीमार रहने लगते हैं। इसका प्रमुख कारण फलों का सही
मात्रा में नहीं मिलना है। रिपोर्ट में लिखा है कि भारतीय बच्चों, महिलाओं और पुरुषों को पर्याप्त मात्रा में फल नहीं मिल पाते हैं। इस
कारण विटामिन की कमी, कुपोषण, खून की
कमी, हीमोग्लोबिन की कमी, आम है। शीला
दीक्षित के बयान से साफ है कि दिल्ली के गरीबों को सिर्फ खराब क्वालिटी का दाल,
चावल और रोटी खाने का अधिकार है। फल और हरी सब्जियों के बारे में वो
सपने में भी नहीं सोच सकता !
इनसबके पश्चात्
एक प्रश्न सरकार के मंसूबों पर उठना स्वाभाविक है की क्या सरकार वाकई में गरीबी
मिटाना चाहती है या नित्य -नए आंकड़ों द्वारा जनता को भ्रमित करती है !
SORCE : NSSO ,
Planning Commission ,योजना हिंदी पत्रिका !
शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012
सर्वशिक्षा अभियान-विद्या ददाति विनयम
अंधकार को कोसने से
अच्छा है ,एक दीपक
जला दिया जाय और शिक्षा ही एक ऐसा दीप है है जो अज्ञानता रूपी अंधकार को हमेशा के
लिए खत्म कर सकता है !!कहा भी गया है ....
"साहित्य , संगीत, कला विहीना ,
साक्षात् पशु पुच्छ विषाण हीना ,
तृणं न खाद्त्रपी जीवमान ,
तद भागदेयम परमं पशुनाम....!!"
साक्षात् पशु पुच्छ विषाण हीना ,
तृणं न खाद्त्रपी जीवमान ,
तद भागदेयम परमं पशुनाम....!!"
सर्वशिक्षा अभियान के रूप में सरकार इसी लक्ष्य पे काम कर रही है ,,इस अभियान का उद्देश्य है उन सभी पिछड़े बच्चों को शिक्षित करना जो कल तक अक्षर और किताबों की दुनिया से अनजान थे !!
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