सोमवार, 14 नवंबर 2011

हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।




हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
पर क्या करें, कमबख्त शत्रु मानता ही नहीं,

शांति की भाषा जानता ही नहीं।।
हमने तो पांडवो की तरह, अफगानिस्तान ,पाकिस्तान, बंगलादेश,कश्मीर घाटी सब छोड़ दिए थे।
पर शत्रु है, कि रूकने का नाम लेता ही नहीं; हमले पर हमला किए जाता है।
कभी दंगा भड़काता है तो, कभी आर डी एक्स  व बम् चलाता है।
भारतीयों को हर जगह से मार भगाता है।।
इस शत्रु ने , न जाने कितने भारतीयों के घर तोड़े
हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
आओ; अपने बचे पांच गांवों(भारत) के लिए, शांति छोड़ कर शस्त्र उठायें,
इस कमबख्त, कमीने शातिर शत्रु को मार भगायें।
हम भी इस पर घर वापसी का, दबाब बनाएं,
न माने तो इस पर बम् चलायें ।
हम शांति तो तब करेंगें, जब हम रहेंगे जब हम ही न रहेंगे ,
तो शमशान घाट की शांति का, भला हम क्या करेंगे।।
आओ बढ़े चलें शहीदों के मार्ग पर,जिन्होंने ऐसे अनेकों शत्रुओं के सिर फोड़े
हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।

चुनौती ‘अस्तित्व की’


मानव स्वभाव विपरीत परिस्थितियों में दो में से एक प्रकार की प्रतिक्रिया का चयन करता है। या तो वह चुनौतियों को स्वीकार कर डटकर उनके सम्मुख खड़े हो, उन परिस्थितियों को प्रति-चुनौती देता है या उनके सम्मुख नतमस्तक हो समायोजन करने का प्रयास करता है और कुण्ठा को अपनी नियति स्वीकार करता है। मैंने कुण्ठा को चुनौती देने का निश्चय किया और अपने जीवन को एक नई राह दी।
बात हाल ही की है जब उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् बेटी के प्रति सामाजिक व पारिवारिक दायित्व कहे जाने वाली रीत अर्थात् बेटी के लिए रिश्ता ढूँढ़ने मेरे पिता को घर की चौखट से बाहर एक विचित्र प्रश्न को अपने मुख पर तमाचे की भाँति सहन करना पड़ा। यह असमंजस्य है कि वह प्रश्न था अथवा उत्तर। शब्द कुछ इस प्रकार के थे कि ‘‘हम तीन बेटियों वाले घर में अपने बेटे का रिश्ता नहीं करेंगे। यहाँ आगे का परिवार तो खत्म ही हो जाना है।’’
संवाद बेहद कटु है परन्तु मानसिकता दया की पात्र है। जब यह उत्तर मैंने अपने माता-पिता के मुख से सुना तो मेरा प्रश्न एक था, ‘‘क्या आपको अपनी तीन बेटियाँ होने का कोई पछतावा, शर्मिंदगी या किसी प्रकार का दुःख है?’’ माता-पिता का उत्तर था- हमें गर्व है अपनी बेटियों पर। तो फिर पापा आप उनको फोन करके कह दीजिए कि आपके सुपुत्र न तो शैक्षिक योग्यता में मेरी बेटी के समतुल्य है और न ही उपलब्धियों में। इसलिए हम अपनी बेटी का विवाह आपके बेटे के साथ करने में अक्षम है।
निश्चित रूप से ऐसे किसी परिवार में विवाह किया जाना जहाँ स्त्री के वजूद का सम्मान न हो, मूर्खता है। परन्तु इस घटना ने मेरे आत्मसम्मान को झकझोर दिया और अपने परिवार की प्रतिष्ठा को उस समाज में पहचान दिलाने का जुनून सवार हो गया जहाँ मानवता व स्वतंत्र मस्तिष्क का वास हो। वर्तमान में मैं अपने दृढ़ संकल्प का अनुसरण करते हुए अपनी मंजिल की सीढ़ी चढ़ रही हूँ और अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने अस्तित्व को भी अपेक्षित पहचान दिला रही हूँ।


चुनौती 'अस्तित्व की ' - दैनिक जागरण के 'झंकार' पृष्ट पर दिनांक 14 नवंबर 2011 को प्रकाशित यह कहानी "मेरी कहानी मेरा जागरण" प्रतियोगिता मे चयनित हुई........... इस कहानी की मूल प्रति समस्त पाठको को समर्पित.....................

शनिवार, 12 नवंबर 2011

गजल



न जाने क्यों लोग
चले जाते हैं
गुमशुम होकर
न जाने किधर
किसकी तलास में
किस हमसफर के ।

मालुम है नही
मिल पायेंगे कभी
फिर भी न जाने क्यों
जी बहुत चाहता हैं उनको ।।
- मंगल यादव, जौनपुर

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गुरुवार, 10 नवंबर 2011

गुरु नानक जी और प्रकाश पर्व


गुरु नानक जी के अमूल्य वचन
भगवान की कृपा प्राप्त करने के केवल दो साधन हैं
* मन को निर्मल बनाये रखना !
** भगवान् के पावन नाम का उच्चारण करते रहना !
गृहस्थ में रहते हुए बुराइयों से डरने वाला अच्छे गुणों को धारण करने वाला भगवान् को हर समय याद रखने वाला !
इस प्रकार से ही भव सागर से पार हो सकता है मानव !

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(फोटो साभार गूगल / नेट से )








गुरु नानक जी और प्रकाश पर्व

धवल चांदनी जग रोशन है
हँसते हुए सितारे
सुमन बरसता – भेज रहे हैं
“पावन-आत्मा”के स्वागत में
माँ टकटकी लगाये
होनहार कब आयें ,,,
आओ घी के दीप जलाएं
गुरु नानक से पूत हमारे
“कोख” अमर कर जाएँ
हो “प्रकाश पर्व ” कुछ ऐसा
दीवाली मन जाए
उनकी शिक्षा दीक्षा से हम
जीवन सफल बनायें
प्रेम की धरा बहे जहां इस
बंधन ना हो कोई
सिंध-पाक -अमृतसर चाहे
ननकाना दरबार
मानव-मानवता भर जाए
वीर-सपूत हजार
गुरु-ग्रन्थ साहिब को माथे
रख के करें प्रचार
सत्य धर्म अरु प्यार अहिंसा
कभी ना होए अत्याचार
पंज-आब से धरती अपनी
श्रम से चलो बनाएं
हरियाली-खुशहाल-शांति
हर प्रदेश फैलाएं
चलो गरीबी भूख को भाई
जग से दूर भगाएं
भूख मिटे फिर ना हो चोरी
गुरु शिक्षा से उन्नत हो के
बनें गुरु हम विश्व पटल में
पंख फैलाएं -उड़ जाएँ हम
नभ के तारे छू छू आयें
“मंथन” सागर कर जाएं
शत सहस्त्र हम दीप जलाएं
रोशन मन तन कर जाएं
हमारे सभी मित्र मण्डली को इस प्रकाश पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाएं – हमारे महापुरुषों का आशीष सदा आप सब पर बरसे -एक प्रभा मंडल और ज्योति आप के माथे पर विराजे ….सभी सपूतों को भ्रमर का नमन …
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर’
हिमाचल
१०.११.२०११ ७.४०-८.२२ पूर्वाह्न