शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

Cashless Economy Vs Shameless Politics (भाग १)


कैशलेस इकोनोमी सिर्फ एक अवधारणा है, वास्तव में ऐसा अभी तक विश्व में ऐसा कहीं भी संभव नहीं हो सका है और शायद यह संभव हो भी नहीं सकेगा. इसलिए हमेशा प्रयास  होते है “लेस कैश इकोनोमी (Less Cash Economy)”  के शायद वह भारत में वर्तमान नोट बंदी से काफी हद तक संभव हो सकेगा. नंदन नील्करनी ने हाल में ही कहा था कि इ-पेमेंट की दिशा में जिस काम को करने में ६ साल लगते वह अब ६ महीने में हो जायेगा. ऐसा हो रहा है बहुत तेजी से कम से कम शहरों में तो ही रहा है. इसके दूरगामी परिणाम होंगे और तुरंत न सही लेकिन इससे लेस कैश इकोनोमी बनने की गति तेज होगी. जो भी हो, ये सही कि अचानक लिए गए नोट बंदी के  निर्णय से जनता को परेशानी हो  रही है लेकिन ये भी सही है कि जनता सरकार के  इस अटपटे से दिखने वाले कार्य सामान्यतया खुश दिख रही है.


विपक्षी दलों ने नोट बंदी के इस फैसले को विरोध का बहुत गंभीर मुद्दा बनाया हुआ है और संसद से सड़क तक विरोध कर रहे हैं. इसका परिणाम ये हो रहा है कि धीरे धीरे जनता भी इन परेशानियों को  मानसिक रूप से वास्तविकता से कहीं अधिक समझाने लगी है. योजना लागू करने में कमिया हो सकती हैं और हैं भी लेकिन क्या विरोध का तरीका इतना सतही होना चाहिए कि जो विपक्षी दल भारत बांध में शामिल न हों उन्हें गद्दार कहा जाय. 

हद तो तब हो गयी जब ममता बनेर्जी ने सेना के नियमित कार्ययोजनाओं को पशिम बंगाल में सैन्य विद्रोह की संज्ञा दी और कहा कि सेना लूट कर रही है. पता नहीं वे पश्चिम बंगाल को एक देश समझती है और खुद को वहां की महारानी. आखिर राज्य में सैन्य विद्रोह की क्या जरूरत ? किसी मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के लिए तो राज्यपाल ही काफी है. सबसे हास्यापद बात तो ये कि उन्होंने आरोप लगाया कि ममता  के प्लेन को कलकत्ता में उतरने में देर की गयी और इससे उनकी जान को खतरा हो सकता था. हर बड़े एअर पोर्ट पर व्यस्त समय में विमान को आसमान में इन्तजार करना पड़ता है और ये समय १५ से ३० मिनट का हो सकता है. मै  स्वयं भी कल मुम्बई एअरपोर्ट पर रात  १० बजे जेट की उड़ान में था जिसे आसमान में लग्न्हाग २० मिनट इन्तजार करना पड़ा.  इंडिगो के  विमान जिसमें ममता जी थीं उनके अतरिक्त लगभग १०० अन्य यात्री थे. क्या ममता की जान पर  ख़तरा करने के लिए १०० अन्य यात्रियों की जान केंद्र सरकार के इशारे पर ली  जा सकती है ? पता नहीं राजनैतिक गिरावट की अंतिम सीमा क्या होगी ?
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शिव प्रकाश मिश्रा 
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